वक़्त की क़ैद में; ज़िन्दगी है मगर... चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं....

Sunday, December 14, 2008

उस दिन मैं मन्दिर जाऊँगा......

ये रोटी मेरी अपनी है
ये कौर निवाले हैं अपने
ये बिस्तर मेरे पैसों की
मेरी नींद - मेरे सपने...

रागों को बनाया मैंने है
ये गीत मेरे ही हैं सारे
सरगम को साँसें मैंने दी
फिर रंग भरे उजरे कारे...

कोयल की कू कू मेरी है
भंवरे की गुंजन है मेरी
मेरी खुशबू है सरसों में
बूंदों की छम - छम है मेरी...

कहाँ था तू जब गुर्बत में
आवाज़ मेरी घुट मरती थी
कहाँ था; जब मेरी आहें
सन्नाटों से डरती थी.....

बना दर्द को गीत किसी दिन
साथ मेरे जब गायेगा
करेगा उस दिन कोई सज़दा
उस दिन कोई मन्दिर जायेगा...




काँटों का भाग नहीं बांटा
क्यों कली में हिस्सा हो तेरा
ये फूल - चमन - झरने - परबत
कुदरत पर हक़ बस है मेरा

तड़प कभी तू भी 'रोटी' को
एक बार 'किचेन' में तू भी जल
सुहाग कभी तेरा भी उजड़े
ठिठुर कभी तू बिन कम्बल...

अरसों तक वो पागल बुढ़िया
तेरे दर पे दीप जलाती थी
जल गई बेचारी 'दंगों' में
तेरी 'रहमत' पे इठलाती थी

हाथ में ले जो 'दिया' कभी तू
उसके कब्र पे आयेगा
करेगा उस दिन कोई सज़दा
उस दिन कोई मन्दिर जायेगा........

जब साज़ पे छेड़ "तमाशाबीन"
मद्धम संगीत सुनाएगा
करूँगा उस दिन मैं सज़दा
उस दिन 'मैं ' मन्दिर जाऊँगा ........






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