वक़्त की क़ैद में; ज़िन्दगी है मगर... चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं....

Wednesday, December 10, 2008

कुछ हवा बदली हुयी है शाम से .....

चौंक उठना युं हमारे नाम से;
कुछ हवा बदली हुयी है शाम से।

इत्तेफाक़न तो नहीं मिलना है ये;
काम कोई आ पड़ा "नाकाम" से।

मेरे 'अधूरे गीत', उनके लब पे हैं;
लग रहा है डर हमें अंजाम से।

ऐ ग़म-ए-दिल, फिर वही जल्दी न कर;
इस दफा आराम से - आराम से - आराम से।

लाख समझा लें, मना लें दिल को हम;
एक नज़र; और जायेगा ये काम से।

4 comments:

  1. ufffff. . . Divine..

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  2. मेरे 'अधूरे गीत', उनके लब पे हैं;
    लग रहा है डर हमें अंजाम से।

    bahut hi khoob.....

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