वक़्त की क़ैद में; ज़िन्दगी है मगर... चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं....

Tuesday, December 15, 2009

रुबाई -- (७)

नई उम्रों का कितना बेसबर हो खून चलता है।
दिन में आँख चलती; रात को नाखून चलता है॥
बरी मानो उसे; जिसको उमर की क़ैद मिलती है
जवानी की अदालत में अलग क़ानून चलता है॥

2 comments:

  1. वाह वाह!! क्या बात कही है शायर ने!!

    बरी मानो उसे; जिसको उमर की क़ैद मिलती है
    जवानी की अदालत में अलग क़ानून चलता है॥

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