वक़्त की क़ैद में; ज़िन्दगी है मगर... चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं....

Friday, December 11, 2009

रुबाई -- (४)

मेरी मंज़िल है नज़रों में; तैयारी भी पूरी है।
मुझे अहसास है साहिल से बस थोड़ी सी दूरी है॥
मेरे दिल का तभी घायल सिपाही पूछ देता है
कि काफ़िर, जंग सारी जीतनी भी क्या ज़रूरी है??

7 comments:

  1. जंग सारे जीतना भी क्या ज़रूरी है??
    बेहद शानदार.. चार पंक्तियों में कितना कुछ कह दिया

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  2. जीवन का जंग जीतना तो बहुत ही जरूरी है। रचना अच्छी है।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  3. Aap Sabhi ka Bahut Bahut Shukriya !!!

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