वक़्त की क़ैद में; ज़िन्दगी है मगर... चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं....

Monday, December 14, 2009

रुबाई -- (६)

ऐसे मजनुओं से प्यार के मौसम संवरते हैं?
जो केवल इश्क करते हैं; वो पत्थर खा के मरते हैं॥
ओ लैला, सोच कर कहना तू किसका कद हुआ ऊंचा
के हम तो नौकरी और इश्क़ दोनों साथ करते हैं॥

Saturday, December 12, 2009

रुबाई -- (५)

जहाँ कश्ती मेरी डूबी; नदी सी बह के रोयी हूँ।
कलेजे से लगाये घाव को मैं सह के रोयी हूँ॥
मैं हंसती हूँ तो आंसू की लकीरें साथ खिंचती हैं
कभी कुछ कह के रोयी हूँ; कभी चुप रह के, रोयी हूँ॥

Friday, December 11, 2009

रुबाई -- (४)

मेरी मंज़िल है नज़रों में; तैयारी भी पूरी है।
मुझे अहसास है साहिल से बस थोड़ी सी दूरी है॥
मेरे दिल का तभी घायल सिपाही पूछ देता है
कि काफ़िर, जंग सारी जीतनी भी क्या ज़रूरी है??

Thursday, December 10, 2009

रुबाई -- (३)

इरादा कर के बैठे हैं कि मंज़िल तक पहुंचना है।
हमारे चैन के मग़रूर क़ातिल तक पहुंचना है॥
के हम तो ताक में हैं कब तेरा चश्मा ज़रा उतरे
तेरी आंखों के रस्ते से तेरे दिल तक पहुंचना है॥

Monday, December 7, 2009

रुबाई -- (२)

रिवाजों के शहर में एक खुशबू बो ही जायेगी।
मोहब्बत धौंस के चंगुल में ज़िद्दी हो ही जायेगी॥
सितम तू लाख कर ले टस से मस वो हो नहीं सकती
पुकारे बांसुरी कान्हा की; राधा तो ही जायेगी॥

Sunday, December 6, 2009

रुबाई -- (१)

जब बरखा तेरी ज़ुल्फ़ भिगाए; सावन अच्छा लगता है।
धूप में जब तू बाल सुखाये; आंगन अच्छा लगता है॥
दुनिया हम जैसे मजनू को पागल पागल कहती है
उस पगली लैला को ये पागलपन अच्छा लगता है॥

Tuesday, December 1, 2009

वो ग़ज़ल कहां की ग़ज़ल हुय़ी....

ग़र खून से लथपथ लफ्ज़ शान से चले नहीं
ग़र सुख़न के तलवे अंगारों पर जले नहीं
ग़र कंठ शेर का नीला हो ना विष पी के
ग़र हर्फ़ की पीड़ा सुनके मुर्दा ना चीखे
ग़र मतला दर्द में पागल होके ना झूमे
ग़र मक़ता घाव की पपड़ी को जा ना चूमे
ग़र शिकन से ज़ख़्मी ना रदीफ़ का भाल हुआ
ग़र रंग काफ़िये का ना थोड़ा लाल हुआ
ग़र बहर की साँसों में दौड़े ललकार नहीं
ग़र ग़ज़ल के सीने में नंगी तलवार नहीं....

तो ग़ज़ल कहां की ग़ज़ल हुयी
वो ग़ज़ल कहां की ग़ज़ल हुयी.....