वक़्त की क़ैद में; ज़िन्दगी है मगर... चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं....

Sunday, November 29, 2009

जब जब चले उसूलों पर...

ख़ुद रिझा रही हो कल से क्यों गजरे बांधे हैं झूलों पर
फिर ना कहना; 'क्यों भंवरा जाके बैठा है फूलों पर'

अजब निराली दुनिया; गोरख-धंधे की तुम हद देखो
मछली ख़ुद जा चोंच से चिपके; और इल्ज़ाम बगूलों पर

नए ज़माने के तेवर हैं; थोड़ा गिरना पड़ता है
पप्पू मन ही मन मुस्काये; रात की नादां भूलों पर

कह दो बुड्ढों से वो दकिया_नूसी* बातें बंद करें
ये देश है वीर जवानों का पर बरकत नामाकूलों** पर

भांड़ में जाए चुनरी साली; लुत्फ़ उठाओ, मौज करो
'काफिर' तुमने मुंह की खायी, जब जब चले उसूलों पर

'काफिर' तुमने मुंह की खायी, जब जब चले उसूलों पर...


*Dakiya_Noosi = Conservative
**Naamaakool = Good for Nothing

8 comments:

  1. उम्दा ग़ज़ल है भाई ....

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  2. अजब निराली दुनिया; गोरख-धंधे की तुम हद देखो
    मछली ख़ुद जा चोंच से चिपके; और इल्ज़ाम बगूलों पर ...

    नये तेवर की ग़ज़ल है .... बहुत लाजवाब ........

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  3. अच्छा अन्दाजे बयां

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  4. भांड़ में जाए चुनरी साली; लुत्फ़ उठाओ, मौज करो
    'काफिर' तुमने मुंह की खायी, जब जब चले उसूलों पर

    गज़ब साहब..बस मार डाला आपने..

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