वक़्त की क़ैद में; ज़िन्दगी है मगर... चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं....

Thursday, November 19, 2009

दर्द का ये जश्न है.....

एक पागल रात में

ख़्वाब में था आ गया
घंटों खड़ा आकाश को
एकटक तकता रहा
और अचानक हंस पड़ा
फिर गालियां बकने लगा

अर्श की दीवार पर
खून से लिखने लगा
वो शरीक-ए-जश्न हों
हाँ वो शरीक-ए-जश्न हों
जिसने धोखे खाये हों
रूह जिसकी लुट गयी
और ठरक की सेज़ पर
जिसकी सांसें घुट गयी

पंख जिसके खो गये
हाथ जिसके कट गये
जो ख़राशों में पले
प्यार से महरूम हों
ज़ख्म है जिसकी बहन
आयें वो बलवाई सब
और फ़िज़ा-ए-दर्द में
एक कतरा रूह दें
एक कतरा रूह दें...

आग सी फैली ख़बर
सुन के मुर्दे जी गये
ज़िन्दगी और मौत को
साथ रख कर पी गये
इंकलाबी आ गये
बेड़ियों को तोड़ कर
हाथ में परचम लिये
आंख में शोले लिये
दांत में हड्डी लिये
जीभ को उलटी किये
'आ गयी' मैं 'आ गया'
हर दिशा से शोर था
रास्ते खुद चल पड़े
चल पड़ी पगडंडियाँ
और दलालों से झगड़कर
मंडियों की रंडियां

मुट्ठियों को भींच कर
चीखती थीं बारहा
जाविदा ये रस्म हो
जाविदा ये साज़ हो
जाविदा इस साज़ पर
दर्द की आवाज़ हो
दर्द का ये जश्न है
दर्द का ये जश्न है
हाँ दर्द का ये जश्न है
दर्द का ये जश्न है....

10 comments:

  1. दर्द का ये जश्न है....

    -बहुत गहरा लिखा..वाह!!

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  2. bahut hi sunder hai...
    saari rachnayien acchi lagi. Likhtey rahiye bawzood kisi khalal ke ...

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  3. दिल को छु गयी रचना । बधाई

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  4. मुट्ठियों को भींच कर
    चीखती थीं बारहा
    जाविदा ये रस्म हो
    जाविदा ये साज़ हो
    जाविदा इस साज़ पर
    दर्द की आवाज़ हो
    दर्द का ये जश्न है
    Bahut Sundar !

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  5. बहुत सुंदर कविता... साधुवाद..

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  6. DARD HI DARD .... DARD KI MAARNIK ABHIVYAKTI HAI AAPKI RACHNA ... KAMAAL KA LIKHA HAI ..

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  7. और फ़िज़ा-ए-दर्द में
    एक कतरा रूह दें
    एक कतरा रूह दें...

    kisi film me geet ki tareh jana chahiye ise to..

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  8. Thank You So much Friends for the Encouraging Words

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