वक़्त की क़ैद में; ज़िन्दगी है मगर... चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं....

Monday, August 31, 2009

आज कोई लाश ज़िंदा रह न जाए....

देखना तुम चीख धीमी रह न जाये
हौसलों की ये इमारत ढह न जाये

रूह है बेदार अब इस ज़ुल्म को
दे अहिंसा की दलीलें; सह न जाये

कैंचियों से काट दो गुलदाउदी को
पीढियां तुझको 'नरम-दिल' कह न जाये

आँख क्या अब थूक में भी खून हो
आज कोई लाश ज़िंदा रह न जाये

दिल तुम्हारा बागियों की फौज सा
'चूडियों-अंगड़ाईयों' में बह न जाये

9 comments:

  1. दिल तुम्हारा बागियों की फौज सा
    'चूडियों-अंगड़ाईयों' में बह न जाये

    बहुत सही बात कही..बधाई..हालांकि गुलदाउदी काटने के बारे मे थोडा शंकित हूँ..नरमदिल होना भी जरूरी है..

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  2. बहुत सुन्दर लाजवाब रचना,।

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  3. uffff....itni berehmi kyun bhala???

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  4. कैंचियों से काट दो गुलदाउदी को
    पीढियां तुझको 'नरम-दिल' कह न जाये

    आँख क्या अब थूक में भी खून हो
    आज कोई लाश ज़िंदा रह न जाये

    SUBHAAN ALLA ...... TEEKHE TEVAR HAIN IS LAJAWAAB GAZAL MEIN ...... SHAANDAAR .....

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  5. सुन्दर कविता
    मेरे ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ पर आप सभी मेरे ब्लोग पर पधार कर मुझे आशीश देकर प्रोत्साहित करें ।
    ” मेरी कलाकृतियों को आपका विश्वास मिला
    बीत गया साल आप लोगों का इतना प्यार मिला”

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  6. कैंचियों से काट दो गुलदाउदी को
    पीढियां तुझको 'नरम-दिल' कह न जाये...aakrosh sa hai kavita me...

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  7. आँख क्या अब थूक में भी खून हो
    आज कोई लाश ज़िंदा रह न जाये

    शानदार तेवर हैं, ऐसे ही तल्ख़ शेर लिखा करो

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