वक़्त की क़ैद में; ज़िन्दगी है मगर... चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं....

Thursday, July 30, 2009

मनाली की वो रात....

नींद में वादी मचल रही थी
धड़कन थम थम के चल रही थी।


सुला के कलियों को फूलों को
खुनक हवाएं टहल रही थी।


किरणें ओस की बूँदें पी के
आसमान से फिसल रही थी।


चाँद मनचला झाँक रहा था
चांदनी कपड़े बदल रही थी।


रूम के बाहर बर्फ जमी थी
और वो अन्दर पिघल रही थी।


उस रात मनाली के सीने में
गूँज पुरानी ग़ज़ल रही थी।

9 comments:

  1. Excellent one, Vishal....has a lot of feelings..

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  2. रूम के बाहर बर्फ जमा था
    और वो अन्दर पिघल रही थी।


    उस रात मनाली के सीने में
    गूँज पुरानी ग़ज़ल रही थी।

    kya baat hai... kya baat hai
    bahut khoob waah waah ..
    are hamse to aur kuch kaha bhi na jaaye..
    fir ek baar ..kyaa baat hai....waah..

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  3. Vaah kyaa baat kahi hai....

    उस रात मनाली के सीने में
    गूँज पुरानी ग़ज़ल रही थी।

    lajawaab likha hai....

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  4. nice poem.. lekin aapne hindi me english word kyo use kiya hai ??

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  5. सुला के कलियों को फूलों को
    खुनक हवाएं टहल रही थी।


    किरणें ओस की बूँदें पी के
    आसमान से फिसल रही थी।


    बहुत सुंदर ......!!

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  6. haan ' barf' istriling hai isliye jami thi kar lein .

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  7. सुला के कलियों को फूलों को
    खुनक हवाएं टहल रही थी।


    किरणें ओस की बूँदें पी के
    आसमान से फिसल रही थी।


    चाँद मनचला झाँक रहा था
    चांदनी कपड़े बदल रही थी।
    Bahut sundar vishal ji.....prakriti se achchha tadatmya.

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  8. Thanks so much friends, for the encouraging words / comments.

    *Harkirat Jee --- Its indeed heartening to see senior people like you visit my blog and guide me. Thanks Indeed.

    Best Regards,
    Vishal Gaurav

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