वक़्त की क़ैद में; ज़िन्दगी है मगर... चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं....

Wednesday, July 1, 2009

ऐतवार को दिन में भी हम सो लेते हैं....

ज़मीं है बंजर; फिर भी सपने बो लेते हैं
जो भी प्यार से मिले, उसी के हो लेते हैं॥

आंखों के दरवाज़े पे बेताब खड़े हैं
अश्कों को आज़ाद करें, चल रो लेते हैं॥

जब अक्सर वो ख़्वाबों में आने लगते हैं
ऐतवार को दिन में भी हम सो लेते हैं॥

उलट उलट के ग़म के मौजे कब तक पहनें
साबुन-सर्फ़ से घिसके इनको धो लेते हैं॥

मैखाने से तौबा कर ली हमने साक़ी
हाँ, महफ़िल में तारे नाचें, तो लेते हैं॥

10 comments:

  1. आंखों के दरवाज़े पे बेताब खड़े हैं
    अश्कों को आज़ाद करें, चल रो लेते हैं॥
    dil ke karib lagi yah panktiyan......................
    waise to sabhi panktiyan achchhi hai ...........

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  2. उलट उलट के ग़म के मौजे कब तक पहनें
    साबुन-सर्फ़ से घिसके इनको धो लेते हैं॥

    Lajawaab haalaat se jhoojhtaa huva sher hai...... lajawaab likha, poori gazal behatreen hai

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  3. मैखाने से तौबा कर ली हमने साक़ी
    हाँ, महफ़िल में तारे नाचें, तो लेते हैं॥

    -:) बहुत सही!!

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  4. बहुत ख़ूब, बधाई

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  5. आपकी ग़ज़ल अच्छी है !
    बस एक-दो शेर का वजन कुछ कम लगा !

    बहरहाल बढ़िया प्रयास है :
    ज़मीं है बंजर; फिर भी सपने बो लेते हैं
    जो भी प्यार से मिले, उसी के हो लेते हैं॥

    शुभकामनाएं !

    आज की आवाज

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  6. उलट उलट के ग़म के मौजे कब तक पहनें
    साबुन-सर्फ़ से घिसके इनको धो लेते हैं॥


    बेहद मौलिक विचार

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  7. उलट उलट के ग़म के मौजे कब तक पहनें
    साबुन-सर्फ़ से घिसके इनको धो लेते हैं॥
    bahut khoob janab...
    behtareen...

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