वक़्त की क़ैद में; ज़िन्दगी है मगर... चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं....

Friday, October 9, 2009

ख़्वाब मेरे दीवाने निकले....

ख़्वाब मेरे दीवाने निकले
तूफाँ से टकराने निकले

तोड़ के सिग्नल; मनमौजी से
गीत मिलन के गाने निकले

सलवट करवट छोड़ के सारे
तुझ संग रात बिताने निकले

मेरे तेरे ख़्वाब जुड़े तो
बेसिर-पैर फ़साने निकले

हाथ समझ कर जिनको थामा
वो केवल दस्ताने निकले

खुशी का घर नीलाम हो गया
ग़म के कई ठिकाने निकले

नींद से खटपट तब से मानो
तारे हमें सताने निकले

उनसे बिछड़े मुद्दत गुज़री
आ के कई ज़माने निकले

फिर यादों के पतझड़ में क्यों
फूल मेरे सिरहाने निकले.......

11 comments:

  1. फिर यादों के पतझड़ में क्यों
    फूल मेरे सिरहाने निकले.......

    awesome lines

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  2. whaoooo... this was really good. u dont miss the rythm even once... great imagery.. and damn good cho1ice of words.. :)
    hats off!

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  3. हाथ समझ कर जिनको थामा
    वो केवल दस्ताने निकले
    फिर यादों के पतझड़ में क्यों
    फूल मेरे सिरहाने निकले....
    वैसे तो पूरी रचना सुन्दर है मगर ये दोनो लाजवाब है। बधाई

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  4. फिर यादों के पतझड़ में क्यों
    फूल मेरे सिरहाने निकले....... achhi baat hai..patjhadh me bhi phool mil rahe hai...

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  5. vaah . कमाल के शेर kahen हैं ......... बहुत लाजवाब

    उनसे बिछड़े मुद्दत गुज़री
    आ के कई ज़माने निकले
    फिर यादों के पतझड़ में क्यों
    फूल मेरे सिरहाने निकले......

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  6. behatareen..............आपको और आपके परिवार को दीपावली की मंगल कामनाएं.

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  7. waah..shaandar gazal kahi hai gaurav ji.
    badhai

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  8. thank you very useful information admin, and pardon me permission to share articles here may help :

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