वक़्त की क़ैद में; ज़िन्दगी है मगर... चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं....

Saturday, July 31, 2010

रुबाई -१२

दूर पर्बत से हवा को मोड़ लाया हूँ..
बादलों का एक गुच्छा तोड़ लाया हूँ...


जो लकीरें चंद बरसों से कहीं गुमराह थीं 
वो लकीरें आज फिर मैं जोड़ लाया हूँ... 

22 comments:

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  2. behtareen, chalo badloon se chand nikla to purre 40 din baad... kya chaliya sukha tha :)

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  3. बादलों का गुच्छा?

    क्या बात है..!

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  4. लाजवाब भाई...वाह...
    नीरज

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  5. bahut khub

    जो लकीरें चंद बरसों से कहीं गुमराह थीं
    वो लकीरें आज फिर मैं जोड़ लाया हूँ...

    hum lakiren tod ke le aayenge ek din

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  6. ०विज्ञप्ति०
    लेखकगण कृपया ध्यान दें-
    देश की चर्चित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक त्रैमासिक पत्रिका ‘सरस्वती सुमन’ का आगामी एक अंक ‘मुक्‍तक विशेषांक’ होगा जिसके अतिथि संपादक होंगे सुपरिचित कवि जितेन्द्र ‘जौहर’। उक्‍त विशेषांक हेतु आपके विविधवर्णी (सामाजिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक, धार्मिक, शैक्षिक, देशभक्ति, पर्व-त्योहार, पर्यावरण, श्रृंगार, हास्य-व्यंग्य, आदि अन्यानेक विषयों/ भावों) पर केन्द्रित मुक्‍तक/रुबाई एवं तद्‌विषयक सारगर्भित एवं तथ्यपूर्ण आलेख सादर आमंत्रित हैं।

    इस संग्रह का हिस्सा बनने के लिए न्यूनतम 10-12 और अधिकतम 20-22 मुक्‍तक भेजे जा सकते हैं।

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    प्रेषित सामग्री के साथ फोटो एवं परिचय भी संलग्न करें। समस्त सामग्री केवल डाक या कुरियर द्वारा (ई-मेल से नहीं) निम्न पते पर शीघ्र भेजें-

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  7. रचनाएँ भेजने का पता:
    जितेन्द्र ‘जौहर’
    (अतिथि संपादक : ‘सरस्वती सुमन’)
    आई आर -13/6, रेणुसागर, सोनभद्र (उप्र) 231218.

    मोबा.नं. +91 9450320472

    ईमेल: jjauharpoet@gmail.com

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  8. वो लकीरें आज मौड़ लाया हूँ
    बहुत सुन्दर
    इंसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता

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  9. bahut acche...maza aa gaya ..thx

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