वक़्त की क़ैद में; ज़िन्दगी है मगर... चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं....

Sunday, May 30, 2010

कहने वालों को कहानी चाहिये....

कहने वालों को कहानी चाहिये
गाँव को पर तर्ज़ुमानी चाहिये 

है सियासी खून जिसने चख लिया 
शर्त कुछ हो; 'राजधानी' चाहिये 

कमसिनों को है तजुरबे की पड़ी 
और ज़ईफ़ों को जवानी चाहिये  

जब मिली 'व्हिस्की' तो 'सोडा' चाहिये  
मिल गया सोडा तो 'पानी' चाहिये  

एक 'राधा' से कहाँ भरता है दिल  
एक 'मीरा' सी दिवानी चाहिये  

एक कोने में खड़ा 'काफ़िर' कहे  
मुझको ग़ज़लों में रवानी चाहिये....


तर्ज़ुमानी  =  translation 
कमसिन  =  कम उम्र वाला / वाली 
ज़ईफ़  =  बुज़ुर्ग  
सियासी  =  political
रवानी  =  Flow / बहाव 

6 comments:

  1. अरे वाह जी बहुत सुंदर जबाब नही

    धन्यवाद

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  2. गज़ब कह गये सर जी...दिलो-दिमाग के अधूरेपन को ख्वाहिशाना अंदाज मे उकेर दिया....खासकर यह
    कमसिनों को है तजुरबे की पड़ी
    और ज़ईफ़ों को जवानी चाहिये
    उस्तादों जैसे अशआर लगते हैं..जबर्दस्त!!

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  3. kya baat hai bandhu.... maja aa gaya... khaaskar ye padh kar:
    कमसिनों को है तजुरबे की पड़ी
    और ज़ईफ़ों को जवानी चाहिये

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  4. एक कोने में खड़ा 'काफ़िर' कहे
    मुझको रब कि मेहरबानी चाहिए ...

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  5. है सियासी खून जिसने चख लिया
    शर्त कुछ हो; 'राजधानी' चाहिये...

    Bahut acche ustaad, aap ke shabd bhaa gayee...

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