वक़्त की क़ैद में; ज़िन्दगी है मगर... चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं....

Friday, February 19, 2010

मैंने बुझी अंगीठी छूकर देखा है....

बासी, फ़ीका, चुभता मंज़र देखा है
सस्ते में नीलाम हुआ घर देखा है

कैसे कैसे ख़्वाबों को गिरवी रख के
गहरी नींद में सोया बिस्तर देखा है

कल तक फूल ही फूल थे जिसकी बातों में
आज उसी के हाथ में पत्थर देखा है

शायद थोड़ी आंच बची हो रिश्ते की
मैंने बुझी अंगीठी छूकर देखा है

तुम ही नब्ज़ टटोलो आके रातों की
हमने तो सूरज भी डर-डर देखा है

'काफ़िर'  को कब रोता देखा दुनिया ने
चादर से मुंह ढकते अक्सर देखा है......

14 comments:

  1. शायद थोड़ी आंच बची हो रिश्ते की
    मैंने बुझी अंगीठी छूकर देखा है

    -वाह! क्या बात है!!

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  2. एक से एक सुन्दर पंक्तियाँ

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  3. शायद थोड़ी आंच बची हो रिश्ते की
    मैंने बुझी अंगीठी छूकर देखा है


    behatareen.

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  4. कैसे कैसे ख़्वाबों को गिरवी रख के
    गहरी नींद में सोया बिस्तर देखा है

    कल तक फूल ही फूल थे जिसकी बातों में
    आज उसी के हाथ में पत्थर देखा है
    गौरव जी लाजवाब
    हर एक शेर कमाल का है शुभकामनायें

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  5. कल तक फूल ही फूल थे जिसकी बातों में
    आज उसी के हाथ में पत्थर देखा है
    मेरे हाथो से तराशे हुए पत्थर के बुत,मुझपे ही बरस पड़े.
    शायद थोड़ी आंच बची हो रिश्ते की
    मैंने बुझी अंगीठी छूकर देखा है ..लाजवाब

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  6. extremely intense and beautifully written...

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  7. सोया बिस्तर ..mitr tumne to neend udaane wali baat kardi.
    bohot achhe. :)

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  8. Amazing Stuff Bro ... You ar eRocking !!

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  9. Please read my blog and let me know what you think!

    http://bestvacationdestinations.blogspot.com/

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  10. बेहद खूबसूरत गजल..अपनी ही कलम को हर बार चेकमेट देने की आदत बना ली है आपने..वैसी ही यह गज़ल..खास कर बिस्तर की नींद की ख्वाहिश..और यह वाला शे’र

    शायद थोड़ी आंच बची हो रिश्ते की
    मैंने बुझी अंगीठी छूकर देखा है

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  11. Dude...its amazing....need a favour...just give me print outs of these............i ll cherish them forever.....

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