वक़्त की क़ैद में; ज़िन्दगी है मगर... चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं....

Wednesday, January 20, 2010

अब इसको भी 'रुबाई' कहूं???

कब तक घुट-घुट सहन करूंगा ?
धौंस का बोझा वहन करुंगा ?
जिस दिन भेजा घूमा, तेरी
'पब्लिक' में 'माँ-बहन' करुंगा.....

'पब्लिक' में 'माँ-बहन' करुंगा.....

4 comments:

  1. sahi hai, kabhi kabhi saamne wale ke hisaab se chalna padta hai.

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  2. भाई सब ठीक तो है ??

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  3. hmmmmmmmmmmmmmmm lagta hai aap; bhut gusse me ho......

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