ज़िद्दी ख़ून उबल पड़ता है
जब साँसों पे बल पड़ता है
जगी आँख का सोया सपना
नींद में अक्सर चल पड़ता है
एक शरारा बुझे तो कोई
और शरारा जल पड़ता है
आंसू ज़ाया ना कर 'काफ़िर'
हवन में 'गंगाजल' पड़ता है...
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Sunday, June 20, 2010
Sunday, May 30, 2010
कहने वालों को कहानी चाहिये....
कहने वालों को कहानी चाहिये
गाँव को पर तर्ज़ुमानी चाहिये
है सियासी खून जिसने चख लिया
शर्त कुछ हो; 'राजधानी' चाहिये
कमसिनों को है तजुरबे की पड़ी
और ज़ईफ़ों को जवानी चाहिये
जब मिली 'व्हिस्की' तो 'सोडा' चाहिये
मिल गया सोडा तो 'पानी' चाहिये
एक 'राधा' से कहाँ भरता है दिल
एक 'मीरा' सी दिवानी चाहिये
एक कोने में खड़ा 'काफ़िर' कहे
मुझको ग़ज़लों में रवानी चाहिये....
तर्ज़ुमानी = translation
कमसिन = कम उम्र वाला / वाली
ज़ईफ़ = बुज़ुर्ग
सियासी = political
रवानी = Flow / बहाव
गाँव को पर तर्ज़ुमानी चाहिये
है सियासी खून जिसने चख लिया
शर्त कुछ हो; 'राजधानी' चाहिये
कमसिनों को है तजुरबे की पड़ी
और ज़ईफ़ों को जवानी चाहिये
जब मिली 'व्हिस्की' तो 'सोडा' चाहिये
मिल गया सोडा तो 'पानी' चाहिये
एक 'राधा' से कहाँ भरता है दिल
एक 'मीरा' सी दिवानी चाहिये
एक कोने में खड़ा 'काफ़िर' कहे
मुझको ग़ज़लों में रवानी चाहिये....
तर्ज़ुमानी = translation
कमसिन = कम उम्र वाला / वाली
ज़ईफ़ = बुज़ुर्ग
सियासी = political
रवानी = Flow / बहाव
Friday, May 21, 2010
प्यार ऐसे जता दीजिये...
प्यार ऐसे जता दीजिये
बेसबब ही सता दीजिये
मेरा ईमान रख लीजिये
मेरे हक़ में ख़ता दीजिये
इतनी रहमत अता कीजिये
जुर्म-ए-काफ़िर बता दीजिये
बंदगी का तलबगार हूँ
अपने घर का पता दीजिये...
बेसबब = without any reason
ख़ता = mistake
रहमत = मेहरबानी
अता = to give
जुर्म-ए-काफ़िर = crime of poet (Kaafir is Pen Name of the Poet)
बंदगी = worship
तलबगार = wisher / चाहने वाला
बेसबब ही सता दीजिये
मेरा ईमान रख लीजिये
मेरे हक़ में ख़ता दीजिये
इतनी रहमत अता कीजिये
जुर्म-ए-काफ़िर बता दीजिये
बंदगी का तलबगार हूँ
अपने घर का पता दीजिये...
बेसबब = without any reason
ख़ता = mistake
रहमत = मेहरबानी
अता = to give
जुर्म-ए-काफ़िर = crime of poet (Kaafir is Pen Name of the Poet)
बंदगी = worship
तलबगार = wisher / चाहने वाला
Saturday, May 15, 2010
हमें साथ ले ले.....
माहो सितारे
हमें साथ ले ले...
उल्फ़त के मारे
हमें साथ ले ले...
हंसाये रुलाये
कोई तो बुलाये
कोई तो पुकारे..
'हमें साथ ले ले'...
पूछे तरन्नुम
गीतों से मेरे
क्यों हो कंवारे?
हमें साथ ले ले...
बोले सुबक कर
काफ़िर नज़ारे;
'काफ़िर; न जा रे'
हमें साथ ले ले...
गुज़रती फ़िज़ा से
गुज़ारिश है गुल की
'हम हैं तुम्हारे..
हमें साथ ले ले'...
हम हैं तुम्हारे
हमें साथ ले ले.....
(माहो सितारे = moon and stars)
(उल्फ़त = love)
(तरन्नुम = melody)
हमें साथ ले ले...
उल्फ़त के मारे
हमें साथ ले ले...
हंसाये रुलाये
कोई तो बुलाये
कोई तो पुकारे..
'हमें साथ ले ले'...
पूछे तरन्नुम
गीतों से मेरे
क्यों हो कंवारे?
हमें साथ ले ले...
बोले सुबक कर
काफ़िर नज़ारे;
'काफ़िर; न जा रे'
हमें साथ ले ले...
गुज़रती फ़िज़ा से
गुज़ारिश है गुल की
'हम हैं तुम्हारे..
हमें साथ ले ले'...
हम हैं तुम्हारे
हमें साथ ले ले.....
(माहो सितारे = moon and stars)
(उल्फ़त = love)
(तरन्नुम = melody)
Friday, May 7, 2010
जहां ख़ामोश होती है; वहीं से बात करती है ....
गिलहरी सूत के धागों को ज्यों तिल-तिल कुतरती है
वो रूठ जाती है तो हम पे यूं गुज़रती है
कोई जाओ बता दो हमनफ़स* को बात इतनी सी
तग़ाफ़ुल* चोट देता है; मोहब्बत घाव भरती है
मुझे आवाज़ दो न दो; मेरी आवाज़ तो सुन लो
तुम्हारे दर से लौटी हर सदा* बेमौत मरती है
ग़ज़ल तू हू-ब-हू 'काफ़िर' के महबूब जैसी है
जहां ख़ामोश होती है; वहीं से बात करती है
मुसव्विर* ने अधूरी; ख़्वाब की तस्वीर छोड़ी थी
मेरी तन्हाई उसमें आसमानी रंग भरती है...
तग़ाफ़ुल = Indifference
सदा = sound
मुसव्विर = Artist / Painter
हमनफ़स = Companion
वो रूठ जाती है तो हम पे यूं गुज़रती है
कोई जाओ बता दो हमनफ़स* को बात इतनी सी
तग़ाफ़ुल* चोट देता है; मोहब्बत घाव भरती है
मुझे आवाज़ दो न दो; मेरी आवाज़ तो सुन लो
तुम्हारे दर से लौटी हर सदा* बेमौत मरती है
ग़ज़ल तू हू-ब-हू 'काफ़िर' के महबूब जैसी है
जहां ख़ामोश होती है; वहीं से बात करती है
मुसव्विर* ने अधूरी; ख़्वाब की तस्वीर छोड़ी थी
मेरी तन्हाई उसमें आसमानी रंग भरती है...
तग़ाफ़ुल = Indifference
सदा = sound
मुसव्विर = Artist / Painter
हमनफ़स = Companion
Thursday, March 4, 2010
'सीता' पे सारा शक़ गया होगा.....
मुझे ये इल्म है कि 'राम' रेखा लांघ बैठा है
मगर अफ़सोस कि 'सीता' पे सारा शक़ गया होगा
चलो 'ईमान' का अब गुमशुदा में नाम लिखवा दें
के 'काफ़िर' ढूंढ कर इंसाफ़; काफ़ी थक गया होगा
सुना है 'बेगुनाही' रास्ते से लौट आयी है
यक़ीनन 'जुर्म' ले फ़रियाद; दिल्ली तक गया होगा
सरासर झूठ है, मैं ख़ुदकुशी करने को आया था
सलीबे* पे मेरा सर कोई क़ातिल रख गया होगा
अदालत! मुफ़लिसों* से इस क़दर तुम मुंह तो मत फेरो
बहुत उम्मीद से वो दर पे दे दस्तक गया होगा....
सलीब* = सूली
मुफ़लिस* = ग़रीब
मगर अफ़सोस कि 'सीता' पे सारा शक़ गया होगा
चलो 'ईमान' का अब गुमशुदा में नाम लिखवा दें
के 'काफ़िर' ढूंढ कर इंसाफ़; काफ़ी थक गया होगा
सुना है 'बेगुनाही' रास्ते से लौट आयी है
यक़ीनन 'जुर्म' ले फ़रियाद; दिल्ली तक गया होगा
सरासर झूठ है, मैं ख़ुदकुशी करने को आया था
सलीबे* पे मेरा सर कोई क़ातिल रख गया होगा
अदालत! मुफ़लिसों* से इस क़दर तुम मुंह तो मत फेरो
बहुत उम्मीद से वो दर पे दे दस्तक गया होगा....
सलीब* = सूली
मुफ़लिस* = ग़रीब
Saturday, February 27, 2010
कदमों के मेरे निशां हैं; सखी....
गलियाँ वहीं राह तकती रहीं
हम ही न जाने कहां हैं सखी
संभल के चलो मिट न जायें कहीं
कदमों के मेरे निशां हैं; सखी
साज़ों ने मुझसे है हंस के कहा
अभी तेरी साँसें जवां हैं सखी
रिहा हो रहे हैं सपने मेरे
चलो देखें कितने जहां हैं सखी
नज़र लेके फूलों से; पढना इन्हें
परियों की ये दास्तां हैं सखी.....
हम ही न जाने कहां हैं सखी
संभल के चलो मिट न जायें कहीं
कदमों के मेरे निशां हैं; सखी
साज़ों ने मुझसे है हंस के कहा
अभी तेरी साँसें जवां हैं सखी
रिहा हो रहे हैं सपने मेरे
चलो देखें कितने जहां हैं सखी
नज़र लेके फूलों से; पढना इन्हें
परियों की ये दास्तां हैं सखी.....
Friday, February 19, 2010
मैंने बुझी अंगीठी छूकर देखा है....
बासी, फ़ीका, चुभता मंज़र देखा है
सस्ते में नीलाम हुआ घर देखा है
कैसे कैसे ख़्वाबों को गिरवी रख के
गहरी नींद में सोया बिस्तर देखा है
कल तक फूल ही फूल थे जिसकी बातों में
आज उसी के हाथ में पत्थर देखा है
शायद थोड़ी आंच बची हो रिश्ते की
मैंने बुझी अंगीठी छूकर देखा है
तुम ही नब्ज़ टटोलो आके रातों की
हमने तो सूरज भी डर-डर देखा है
'काफ़िर' को कब रोता देखा दुनिया ने
चादर से मुंह ढकते अक्सर देखा है......
सस्ते में नीलाम हुआ घर देखा है
कैसे कैसे ख़्वाबों को गिरवी रख के
गहरी नींद में सोया बिस्तर देखा है
कल तक फूल ही फूल थे जिसकी बातों में
आज उसी के हाथ में पत्थर देखा है
शायद थोड़ी आंच बची हो रिश्ते की
मैंने बुझी अंगीठी छूकर देखा है
तुम ही नब्ज़ टटोलो आके रातों की
हमने तो सूरज भी डर-डर देखा है
'काफ़िर' को कब रोता देखा दुनिया ने
चादर से मुंह ढकते अक्सर देखा है......
Sunday, February 14, 2010
जी उठा एहसास फिर....
जी उठा एहसास फिर; नेअमत* ख़ुदा की है
ख़ूब जानूं; ये ख़ुमारी* इब्तदा* की है
ख़ामियां उनकी सभी; 'अंदाज़' लगते हैं
या इलाही! ये नज़र कैसी अता* की है?
इश्क़ का मैं बेअदब*, हारा खिलाड़ी हूँ
इस दफ़ा बाज़ी मगर अहद-ए-वफ़ा* की है
आंसुओं से आसमां का रंग बदलेगा
आज अरसों बाद 'काफ़िर' ने दुआ की है
आइये अब आज़मा के देखिये हमको
जब तलक धड़कन चले ये सांस बाक़ी है...
नेअमत = Precious / Invaluable Thing
ख़ुमारी = Hangover
इब्तदा = Beginning
अता = To Give
बेअदब = Ill-Mannered
अहद-ए-वफ़ा = Promise of Loyalty
ख़ूब जानूं; ये ख़ुमारी* इब्तदा* की है
ख़ामियां उनकी सभी; 'अंदाज़' लगते हैं
या इलाही! ये नज़र कैसी अता* की है?
इश्क़ का मैं बेअदब*, हारा खिलाड़ी हूँ
इस दफ़ा बाज़ी मगर अहद-ए-वफ़ा* की है
आंसुओं से आसमां का रंग बदलेगा
आज अरसों बाद 'काफ़िर' ने दुआ की है
आइये अब आज़मा के देखिये हमको
जब तलक धड़कन चले ये सांस बाक़ी है...
नेअमत = Precious / Invaluable Thing
ख़ुमारी = Hangover
इब्तदा = Beginning
अता = To Give
बेअदब = Ill-Mannered
अहद-ए-वफ़ा = Promise of Loyalty
Tuesday, February 2, 2010
इश्क़ पर हावी यहाँ दस्तूर दिखता है...
इश्क़ पर हावी यहाँ दस्तूर दिखता है
कमनज़र हूँ; पास है जो, दूर दिखता है
झूठ के सब रहनुमा आगे निकल गये
सच का पुतला चौक पे मजबूर दिखता है
रौनक-ए-महफ़िल हुआ करता था कॉलेज में
आज ऑफिस में झुका मज़दूर दिखता है
अफवाह थी शायद समय सब घाव भर देगा
पट्टियां खोलीं तो अब नासूर दिखता है
नींद में अक्सर सुना वो बड़बड़ाता है..
"माँ तुझी में तो ख़ुदा सा नूर दिखता है"....
कमनज़र हूँ; पास है जो, दूर दिखता है
झूठ के सब रहनुमा आगे निकल गये
सच का पुतला चौक पे मजबूर दिखता है
रौनक-ए-महफ़िल हुआ करता था कॉलेज में
आज ऑफिस में झुका मज़दूर दिखता है
अफवाह थी शायद समय सब घाव भर देगा
पट्टियां खोलीं तो अब नासूर दिखता है
नींद में अक्सर सुना वो बड़बड़ाता है..
"माँ तुझी में तो ख़ुदा सा नूर दिखता है"....
Tuesday, January 26, 2010
हादसों की ज़द में फिर संसद नहीं हो....
नफ़रतों की, रूह में आमद नहीं हो
हादसों की ज़द में फिर संसद नहीं हो
उस परिंदे की नज़र देना मुझे रब
जिसकी आँखों में कहीं सरहद नहीं हो
मज़हबी तामीर ही आओ गिरा दें
एक फ़िरके का बचा गुम्बद नहीं हो
तारीक़-ए-तारीख़ पर मलहम लगाएं
और कोशिश में 'छुपा मक़सद' नहीं हो
झुक के भाई से गले न मिल सकें हम
या ख़ुदा इतना किसी का क़द नहीं हो
'ओम' का टीका लगा सजदे करें सब
आज पागलपन की कोई हद नहीं हो
पाँव ज़िद्दी और होते जा रहे हैं
कौन हँसता था कि 'तुम अंगद नहीं हो'
आज सच का जाम पी कुछ बोल लूं मैं
क्या पता कल ये नशा शायद नहीं हो....
हादसों की ज़द में फिर संसद नहीं हो
उस परिंदे की नज़र देना मुझे रब
जिसकी आँखों में कहीं सरहद नहीं हो
मज़हबी तामीर ही आओ गिरा दें
एक फ़िरके का बचा गुम्बद नहीं हो
तारीक़-ए-तारीख़ पर मलहम लगाएं
और कोशिश में 'छुपा मक़सद' नहीं हो
झुक के भाई से गले न मिल सकें हम
या ख़ुदा इतना किसी का क़द नहीं हो
'ओम' का टीका लगा सजदे करें सब
आज पागलपन की कोई हद नहीं हो
पाँव ज़िद्दी और होते जा रहे हैं
कौन हँसता था कि 'तुम अंगद नहीं हो'
आज सच का जाम पी कुछ बोल लूं मैं
क्या पता कल ये नशा शायद नहीं हो....
Friday, January 22, 2010
मैं गुज़रा नहीं ऐसी राहों से पहले.....
नाम-ए-मोहब्बत हो शाहों से पहले
मैं गुज़रा नहीं ऐसी राहों से पहले
इबादत में झुकने को चंदा फ़लक से
आया इधर ईदगाहों से पहले
मैं किस्तों में थोडा सा मर-मर के जी लूं
तेरे गेसुओं की पनाहों से पहले
ज़बां से भी कह देंगे वो लफ्ज़ जानां
ज़रा बात कर लूं निगाहों से पहले
ख़ुदा मुन्सिफ़ी* में मुझे इतना हक़ दे
जी भर के हंस लूं, कराहों से पहले
हथेली की रेखा पे अफ़सोस इतना
सज़ा है मुक़र्रर*; गुनाहों से पहले....
मुन्सिफ़ी = Judgement / Justice
मुक़र्रर = Decided
मैं गुज़रा नहीं ऐसी राहों से पहले
इबादत में झुकने को चंदा फ़लक से
आया इधर ईदगाहों से पहले
मैं किस्तों में थोडा सा मर-मर के जी लूं
तेरे गेसुओं की पनाहों से पहले
ज़बां से भी कह देंगे वो लफ्ज़ जानां
ज़रा बात कर लूं निगाहों से पहले
ख़ुदा मुन्सिफ़ी* में मुझे इतना हक़ दे
जी भर के हंस लूं, कराहों से पहले
हथेली की रेखा पे अफ़सोस इतना
सज़ा है मुक़र्रर*; गुनाहों से पहले....
मुन्सिफ़ी = Judgement / Justice
मुक़र्रर = Decided
Saturday, January 2, 2010
न जाने वो लहंगा कहां बांधते हैं....
सुना है सनम की कमर ही नहीं है
न जाने वो लहंगा कहां बांधते हैं
ग़ज़ल कहने वाले हैं लब सिल के बैठे
जो आये थे सुनने; समां बांधते हैं
चलो उन मुसाफ़िरों को साथ ले लो
जो गठरी में आह-ओ-फ़ुगां बांधते हैं
तुम नाहक मेरे स्वप्न रोके खड़े हो
कहीं रस्सियों से धुआं बांधते हैं ?
मेरी शायरी इक इबादत है उनकी
जो पलकों से आब-ए-रवां बांधते हैं....
सुना है सनम की कमर ही नहीं है
न जाने वो लहंगा कहां बांधते हैं.......
(फ़ुगां = दुहाई)
(आब-ए-रवां = बहता पानी)
न जाने वो लहंगा कहां बांधते हैं
ग़ज़ल कहने वाले हैं लब सिल के बैठे
जो आये थे सुनने; समां बांधते हैं
चलो उन मुसाफ़िरों को साथ ले लो
जो गठरी में आह-ओ-फ़ुगां बांधते हैं
तुम नाहक मेरे स्वप्न रोके खड़े हो
कहीं रस्सियों से धुआं बांधते हैं ?
मेरी शायरी इक इबादत है उनकी
जो पलकों से आब-ए-रवां बांधते हैं....
सुना है सनम की कमर ही नहीं है
न जाने वो लहंगा कहां बांधते हैं.......
(फ़ुगां = दुहाई)
(आब-ए-रवां = बहता पानी)
Monday, December 28, 2009
हंसी में सिसकियों को ढो रहा हूं...
हंसी में सिसकियों को ढो रहा हूं
मैं गिरता जा रहा हूं; खो रहा हूं
कुछ ऐसे दाग़ हैं कॉलर पे मेरे
कई अरसों से जिनको धो रहा हूं
मैंने थक के आंखें मूंद क्या ली
शहर में शोर कि मैं सो रहा हूं
मेरे ओहदे का बढ़ना लाज़िमी है
मैं रंडी से तवायफ़ हो रहा हूं
मेरी तहरीर गीली क्यों न होगी?
मैं इन ग़ज़लों में छुपके रो रहा हूं...
मैं गिरता जा रहा हूं; खो रहा हूं
कुछ ऐसे दाग़ हैं कॉलर पे मेरे
कई अरसों से जिनको धो रहा हूं
मैंने थक के आंखें मूंद क्या ली
शहर में शोर कि मैं सो रहा हूं
मेरे ओहदे का बढ़ना लाज़िमी है
मैं रंडी से तवायफ़ हो रहा हूं
मेरी तहरीर गीली क्यों न होगी?
मैं इन ग़ज़लों में छुपके रो रहा हूं...
Sunday, November 29, 2009
जब जब चले उसूलों पर...
ख़ुद रिझा रही हो कल से क्यों गजरे बांधे हैं झूलों पर
फिर ना कहना; 'क्यों भंवरा जाके बैठा है फूलों पर'
अजब निराली दुनिया; गोरख-धंधे की तुम हद देखो
मछली ख़ुद जा चोंच से चिपके; और इल्ज़ाम बगूलों पर
नए ज़माने के तेवर हैं; थोड़ा गिरना पड़ता है
पप्पू मन ही मन मुस्काये; रात की नादां भूलों पर
कह दो बुड्ढों से वो दकिया_नूसी* बातें बंद करें
ये देश है वीर जवानों का पर बरकत नामाकूलों** पर
भांड़ में जाए चुनरी साली; लुत्फ़ उठाओ, मौज करो
'काफिर' तुमने मुंह की खायी, जब जब चले उसूलों पर
'काफिर' तुमने मुंह की खायी, जब जब चले उसूलों पर...
*Dakiya_Noosi = Conservative
**Naamaakool = Good for Nothing
फिर ना कहना; 'क्यों भंवरा जाके बैठा है फूलों पर'
अजब निराली दुनिया; गोरख-धंधे की तुम हद देखो
मछली ख़ुद जा चोंच से चिपके; और इल्ज़ाम बगूलों पर
नए ज़माने के तेवर हैं; थोड़ा गिरना पड़ता है
पप्पू मन ही मन मुस्काये; रात की नादां भूलों पर
कह दो बुड्ढों से वो दकिया_नूसी* बातें बंद करें
ये देश है वीर जवानों का पर बरकत नामाकूलों** पर
भांड़ में जाए चुनरी साली; लुत्फ़ उठाओ, मौज करो
'काफिर' तुमने मुंह की खायी, जब जब चले उसूलों पर
'काफिर' तुमने मुंह की खायी, जब जब चले उसूलों पर...
*Dakiya_Noosi = Conservative
**Naamaakool = Good for Nothing
Thursday, November 5, 2009
इश्क फिर हड़ताल पर है...
ख़्वाब जा सोया लचकती डाल पर है
हंसता कालीदास मेरे हाल पर है ॥
दिन हवाले नौकरी के; और जिम्मा
रात का; उस बेसुरे कव्वाल पर है ॥
अर्जियां ले दिल निकम्मा फ़िर रहा है
बेख़बर है; इश्क फिर हड़ताल पर है ॥
जायेगा ये ऊँट कि रानी कटेगी
फ़ैसला बाज़ी की अगली चाल पर है ॥
आओ हम तुम साथ में गंगा नहा लें
सुनते हैं ये कुम्भ बारह साल पर है ॥
हंसता कालीदास मेरे हाल पर है ॥
दिन हवाले नौकरी के; और जिम्मा
रात का; उस बेसुरे कव्वाल पर है ॥
अर्जियां ले दिल निकम्मा फ़िर रहा है
बेख़बर है; इश्क फिर हड़ताल पर है ॥
जायेगा ये ऊँट कि रानी कटेगी
फ़ैसला बाज़ी की अगली चाल पर है ॥
आओ हम तुम साथ में गंगा नहा लें
सुनते हैं ये कुम्भ बारह साल पर है ॥
Saturday, October 17, 2009
आकाश की दिवाली....
तारों का कोई गुट रहा होगा
चौक पर जो जुट रहा होगा
रंग ओढी अल्पना के पास
नूर का झुरमुट रहा होगा
आतिशफिशां माहौल है कल से
तम का दम तो घुट रहा होगा
चांदनी माहिर है 'पत्तों' में
चाँद पक्का लुट रहा होगा
रात जल के गिर रही होगी
और पर्दा उठ रहा होगा
चौक पर जो जुट रहा होगा
रंग ओढी अल्पना के पास
नूर का झुरमुट रहा होगा
आतिशफिशां माहौल है कल से
तम का दम तो घुट रहा होगा
चांदनी माहिर है 'पत्तों' में
चाँद पक्का लुट रहा होगा
रात जल के गिर रही होगी
और पर्दा उठ रहा होगा
Friday, October 9, 2009
ख़्वाब मेरे दीवाने निकले....
ख़्वाब मेरे दीवाने निकले
तूफाँ से टकराने निकले
तोड़ के सिग्नल; मनमौजी से
गीत मिलन के गाने निकले
सलवट करवट छोड़ के सारे
तुझ संग रात बिताने निकले
मेरे तेरे ख़्वाब जुड़े तो
बेसिर-पैर फ़साने निकले
हाथ समझ कर जिनको थामा
वो केवल दस्ताने निकले
खुशी का घर नीलाम हो गया
ग़म के कई ठिकाने निकले
नींद से खटपट तब से मानो
तारे हमें सताने निकले
उनसे बिछड़े मुद्दत गुज़री
आ के कई ज़माने निकले
तूफाँ से टकराने निकले
तोड़ के सिग्नल; मनमौजी से
गीत मिलन के गाने निकले
सलवट करवट छोड़ के सारे
तुझ संग रात बिताने निकले
मेरे तेरे ख़्वाब जुड़े तो
बेसिर-पैर फ़साने निकले
हाथ समझ कर जिनको थामा
वो केवल दस्ताने निकले
खुशी का घर नीलाम हो गया
ग़म के कई ठिकाने निकले
नींद से खटपट तब से मानो
तारे हमें सताने निकले
उनसे बिछड़े मुद्दत गुज़री
आ के कई ज़माने निकले
फिर यादों के पतझड़ में क्यों
फूल मेरे सिरहाने निकले.......
Monday, October 5, 2009
शराब में बुराई क्या है...
बेवफ़ा कौन है यहाँ; बा-वफ़ाई क्या है ?
बहुत मुश्किल है समझना; 'सच्चाई' क्या है ?
जब दर्द ही सुकून दे और सुकूँ मीठा दर्द दे
चारागर ! भला इस मर्ज़ की दवाई क्या है ?
सवाल ये नहीं कि मोहब्बत की पगार कितनी है
सवाल ये है कि 'उपरी कमाई' क्या है ?
इंतज़ार, इज़हार, इबादत; सब तो किया है मैंने
और कैसे जताऊं; इश्क की गहराई क्या है ?
वो गंगाजल से पाक़ है जो पी के 'काफ़िर' सच कहे
होश में बताओ; शराब में बुराई क्या है ?
आंखों की गोद से निकले तो ता-उम्र यतीम रहे
उन आंसुओं से सुनिए; 'माँ से जुदाई' क्या है ?
बहुत मुश्किल है समझना; 'सच्चाई' क्या है ?
जब दर्द ही सुकून दे और सुकूँ मीठा दर्द दे
चारागर ! भला इस मर्ज़ की दवाई क्या है ?
सवाल ये नहीं कि मोहब्बत की पगार कितनी है
सवाल ये है कि 'उपरी कमाई' क्या है ?
इंतज़ार, इज़हार, इबादत; सब तो किया है मैंने
और कैसे जताऊं; इश्क की गहराई क्या है ?
वो गंगाजल से पाक़ है जो पी के 'काफ़िर' सच कहे
होश में बताओ; शराब में बुराई क्या है ?
आंखों की गोद से निकले तो ता-उम्र यतीम रहे
उन आंसुओं से सुनिए; 'माँ से जुदाई' क्या है ?
Wednesday, September 23, 2009
गीत को मेरे, तेरी आवाज़ भी तो चाहिये....
दर्द को इन धड़कनों का साज़ भी तो चाहिये
गीत को मेरे, तेरी आवाज़ भी तो चाहिये
सिर्फ़ दौलत के सहारे 'ताज' कब बनते मियां
सरफिरों में कुछ ग़म-ए-मुमताज़ भी तो चाहिये
हुस्न की रानाईयां सब कुछ नहीं है गुलबदन
दिल को छूने के लिए; "अंदाज़" भी तो चाहिये
पंख के ज़ख्मों की टीसें; यूं तो थोडी कम सी है
उड़ने को पर हसरत-ए-परवाज़ भी तो चाहिये
जाम छलकाने फ़क़त से महफ़िलें सजती नहीं
दमसाज़ भी तो चाहिये; दिलनाज़ भी तो चाहिये
गीत को मेरे, तेरी आवाज़ भी तो चाहिये...
गीत को मेरे, तेरी आवाज़ भी तो चाहिये
सिर्फ़ दौलत के सहारे 'ताज' कब बनते मियां
सरफिरों में कुछ ग़म-ए-मुमताज़ भी तो चाहिये
हुस्न की रानाईयां सब कुछ नहीं है गुलबदन
दिल को छूने के लिए; "अंदाज़" भी तो चाहिये
पंख के ज़ख्मों की टीसें; यूं तो थोडी कम सी है
उड़ने को पर हसरत-ए-परवाज़ भी तो चाहिये
जाम छलकाने फ़क़त से महफ़िलें सजती नहीं
दमसाज़ भी तो चाहिये; दिलनाज़ भी तो चाहिये
गीत को मेरे, तेरी आवाज़ भी तो चाहिये...
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