वक़्त की क़ैद में; ज़िन्दगी है मगर... चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं....
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Saturday, July 31, 2010

रुबाई -१२

दूर पर्बत से हवा को मोड़ लाया हूँ..
बादलों का एक गुच्छा तोड़ लाया हूँ...


जो लकीरें चंद बरसों से कहीं गुमराह थीं 
वो लकीरें आज फिर मैं जोड़ लाया हूँ... 

Sunday, May 16, 2010

रुबाई - १०

मैं कब कहती हूँ मुझको तोहफ़े-गहने दो..
मैं एक हवा का झोंका हूँ; बस बहने दो..
तुम जैसे हो वैसे ही अच्छे लगते हो 
मैं जैसी हूँ; वैसी ही मुझको रहने दो.... 

Sunday, April 25, 2010

रुबाई - (९)

इन्साफ़ हैरां लफ्ज़ की तक़लीद से है..  
ये अदालत तस्दीक़-ओ-तरदीद से है.. 

सच के हक़ में फ़ैसला जाये तो मानूं
"बाँझ औरत"  इस दफ़ा 'उम्मीद से'  है.....


तक़लीद = बिना सोचे समझे अनुकरण (follow) करना
तस्दीक़ = सही ठहराना (support  करना) 
ओ = और
तरदीद = खंडन करना (opposite of  तस्दीक़)

Wednesday, January 20, 2010

अब इसको भी 'रुबाई' कहूं???

कब तक घुट-घुट सहन करूंगा ?
धौंस का बोझा वहन करुंगा ?
जिस दिन भेजा घूमा, तेरी
'पब्लिक' में 'माँ-बहन' करुंगा.....

'पब्लिक' में 'माँ-बहन' करुंगा.....

Tuesday, January 19, 2010

रुबाई - (८)

दर्द भी एक परिंदा है; मालूम हुआ
आँखों का बाशिंदा* है; मालूम हुआ..
कल 'पिक्चर' में हिचक-हिचक के रोया तब,
'मुझमें बच्चा ज़िंदा  है'; मालूम हुआ....

*बाशिंदा = रहने वाला / निवासी

Tuesday, December 15, 2009

रुबाई -- (७)

नई उम्रों का कितना बेसबर हो खून चलता है।
दिन में आँख चलती; रात को नाखून चलता है॥
बरी मानो उसे; जिसको उमर की क़ैद मिलती है
जवानी की अदालत में अलग क़ानून चलता है॥

Monday, December 14, 2009

रुबाई -- (६)

ऐसे मजनुओं से प्यार के मौसम संवरते हैं?
जो केवल इश्क करते हैं; वो पत्थर खा के मरते हैं॥
ओ लैला, सोच कर कहना तू किसका कद हुआ ऊंचा
के हम तो नौकरी और इश्क़ दोनों साथ करते हैं॥

Saturday, December 12, 2009

रुबाई -- (५)

जहाँ कश्ती मेरी डूबी; नदी सी बह के रोयी हूँ।
कलेजे से लगाये घाव को मैं सह के रोयी हूँ॥
मैं हंसती हूँ तो आंसू की लकीरें साथ खिंचती हैं
कभी कुछ कह के रोयी हूँ; कभी चुप रह के, रोयी हूँ॥

Friday, December 11, 2009

रुबाई -- (४)

मेरी मंज़िल है नज़रों में; तैयारी भी पूरी है।
मुझे अहसास है साहिल से बस थोड़ी सी दूरी है॥
मेरे दिल का तभी घायल सिपाही पूछ देता है
कि काफ़िर, जंग सारी जीतनी भी क्या ज़रूरी है??

Thursday, December 10, 2009

रुबाई -- (३)

इरादा कर के बैठे हैं कि मंज़िल तक पहुंचना है।
हमारे चैन के मग़रूर क़ातिल तक पहुंचना है॥
के हम तो ताक में हैं कब तेरा चश्मा ज़रा उतरे
तेरी आंखों के रस्ते से तेरे दिल तक पहुंचना है॥

Monday, December 7, 2009

रुबाई -- (२)

रिवाजों के शहर में एक खुशबू बो ही जायेगी।
मोहब्बत धौंस के चंगुल में ज़िद्दी हो ही जायेगी॥
सितम तू लाख कर ले टस से मस वो हो नहीं सकती
पुकारे बांसुरी कान्हा की; राधा तो ही जायेगी॥

Sunday, December 6, 2009

रुबाई -- (१)

जब बरखा तेरी ज़ुल्फ़ भिगाए; सावन अच्छा लगता है।
धूप में जब तू बाल सुखाये; आंगन अच्छा लगता है॥
दुनिया हम जैसे मजनू को पागल पागल कहती है
उस पगली लैला को ये पागलपन अच्छा लगता है॥