Sunday, May 23, 2010
इतनी आसानी से नहीं मरुंगा....
अट्ठाईस साल कोई मरने की उम्र नहीं होती..
फ़क़त 'दो उम्र क़ैद'..
तो क्या जो एक एक लम्हा घुटा हूँ..
जिस्म की क़ैद में
बदन नोचा गया
खाल उधेरी गयी
नाखून उखाड़े गये
छाती दागी गयी..
जुर्म?
वो क्या चीज़ है?
हाँ किसी ने एक दफ़ा कहा ज़रूर था...
"दरअसल तुम बोलते बहुत हो"
"बहस करते हो"
"उकसाते रहते हो"
"ख़ामोश नहीं बैठते"
"मरते भी तो नहीं..."
कैसे मर जाऊं इतनी आसानी से?
अभी मुर्दे चाँद में जान डालनी है..
समेटना है धूप के टुकड़ों को..
गीतों को आवाज़ देनी है..
संवारना है नग़मों को..
पुचकारना है अपने ज़ख्मों को..
तुम्हारे आंसू पोंछने हैं..
बहुत ज़िम्मेदारियां हैं भई
"मैं तुम्हारा ख़्वाब जो हूँ"
वही पुराना ज़िद्दी ख़्वाब
और वही पुरानी शर्त..
कि;
"बोलुंगा"
"बहस करुंगा "
"उकसाता रहुंगा"
"ख़ामोश नहीं बैठुंगा"
"और न इतनी आसानी से मरुंगा"
ख़्वाब यूं नहीं मरा करते.....
Tuesday, April 20, 2010
सखी....
सखी मेरे सजदे की तामीर हो तुम
सखी तुम दुआ हो; सखी तुम अजां हो
सखी पाक रिश्ते की तासीर हो तुम
मेरी रूह के ज़ख़्मी हिस्से में शामिल
परियों; फ़रिश्तों के किस्से में शामिल
मोहब्बत कहीं दफ़्न होती है मर के?
यक़ीं है कि किस्मत की रेखा से लड़ के...
लहू बन के मेरे रगों में बहोगी...
किसी रात तारों से आ के कहोगी...
मैं तुझमें हूँ ज़िंदा... मैं तुझमें बसी हूँ...
मैं तुझमें हूँ ज़िंदा... मैं तुझमें बसी हूँ...
अँधेरा ये ग़म का घना हो तो क्या है?
उजाले का आना मना हो तो क्या है?
किसी ने बिछड़ते हुये सच कहा था
फ़क़त जिस्म क्या है; फ़ना हो तो क्या है?
गायेगी बुलबुल तेरा नाम लेकर
लौटेगा सूरज वही शाम लेकर
उसी शाम ने एक वादा किया है
सुना है उसी शाम ने कह दिया है...
सखी तुम 'सदा' हो; सदा ही रहोगी
किसी रात तारों से आ के कहोगी...
मैं तुझमें हूँ ज़िंदा... मैं तुझमें बसी हूँ...
मैं तुझमें हूँ ज़िंदा... मैं तुझमें बसी हूँ...
ताबीर = परिणाम
तामीर = निर्माण
तासीर = असर
फ़ना = मौत / ख़त्म
सदा = आवाज़ / हमेशा
Sunday, February 28, 2010
और लम्हें तोड़ लूं मैं.....
जीत भी वो हार थी जो ख़ुद से नज़रें ना मिले तो..
ज़िन्दगी के साज़ पर जब ख़त्म हों ये सिलसिले तो..
हार थी या जीत ज्यादा; आंकड़ों को जोड़ लूं मैं
वक़्त की शाखों से थोड़े और लम्हें तोड़ लूं मैं
अनकहे लफ़्ज़ों को एक आवाज़ दे दूं आख़िरी दम..
अनसुने गीतों को अपने राज़ दे दूं आख़िरी दम..
अनमने शब् को नया आग़ाज़ दे दूं आख़िरी दम..
अनधुली माज़ी की चादर आख़िरी दम ओढ़ लूं मैं
वक़्त की शाखों से थोड़े और लम्हें तोड़ लूं मैं
वक़्त की शाखों से थोड़े और लम्हें तोड़ लूं मैं.....
Monday, February 8, 2010
ये परी कहाँ से आयी है....
जो छिपी हुयी थी बूँद कहीं
अलसाई किरणों सी आ के
धरती पे मुस्कायी है....
परी कहाँ से आयी है...
ये परी कहाँ से आयी है....
छोटी उंगली, बंद है मुट्ठी
टिमटिम आँखें प्यारी सी
झट देखे और झट सो जाए
चंचल राजदुलारी सी
जीभ निकाले, कनखी मारे
घूरे आते जाते को
अलग नज़रिया देते जाये
सारे रिश्ते नाते को
बड़े रुतों के बाद नयन में
'रुत झिलमिल' सी छायी है
परी कहाँ से आयी है...
ये परी कहाँ से आयी है....
मम्मी-पापा की आँखों में
ढूंढें एक कहानी को
सफ़र की सारी बात बताये
बगल में लेटी नानी को
खाना पीना मस्त रहा सब
किसी चीज़ की 'फ़ाइट' नहीं
बस कमरा 'कंजस्टेड' था और
नौ महीने से 'लाइट' नहीं
सुन के ऐसी न्यारी बातें
नानी भी शरमाई है...
परी कहाँ से आयी है...
ये परी कहाँ से आयी है....
सीपी से कोई मोती निकला
दुआ की ख़ुशबू साथ लिये
डोली उतरी फ़लक से मानो
तारों की बारात लिये
काजल का एक टीका करके
चंदा माथा चूम रहा
जुगनू की लोरी सुन-सुन के
घर आंगन सब झूम रहा
वक़्त ने करवट बदला देखो
ख़ुशी ने ली अंगड़ाई है
परी कहाँ से आयी है
ये परी कहाँ से आयी है...
ये परी कहाँ से आयी है !!!
*अब्र = बादल
Sunday, January 17, 2010
मैं रूठती हूँ इसलिये....
बेवजह...
रूठने को जी करता है
कोई ख़ास झगड़ा तो नहीं हुआ
कोई 'harsh' बात भी नहीं कही तुमने
कल रात तक तो हंस बोल रही थी मैं
फिर भी...
बस यूँ ही...
आज 'coffee' तुम बनाओ...
और शक्कर उतनी; जितनी 'मुझे' पसंद है...
और फिर मुझे 'Long Drive ' पे ले चलो...
बस यूँ ही...
'Shopping' करनी है तो बस करनी है...
क्या हर बात में 'Reasoning' ज़रूरी है?
बस यूँ ही...
किसी नये नाम से पुकारो मुझे
थोड़ा पुचकारो, दुलारो मुझे...
jokes सुनाओ, हंसाओ...
खूब बकबक करो....
जैसे मैं करती हूँ...
जब तुम्हारा मूड ऑफ होता है....
बस यूँ ही...
मैं आज तुम्हें ignore करूंगी
या यूँ कहो
कि ignore करने का नाटक करूंगी
हंसी आएगी तो दांतों से होंठ काट लूंगी....
हाँ यूँ ही....
फिर पूछना मुझसे, 'क्या हुआ'
और मैं कहूँगी 'कुछ नहीं'
और तुम फिर पूछना 'स्वीटी क्या हुआ, बताओ ना'
और मैं मुंह फेर के कहूँगी
'just leave it'
और तुम फिर पूछना...
चलने देना ये सिलसिला
बार बार पूछना
ज़ुल्फ़ों को सहलाते हुये
उँगलियों से गुदगुदाते हुये
और यक़ायक मुझे बांहों में भर लेना...
कहना, 'माय बेबी'...
उफ्फ्फ्फ़...
शायद तुम्हें इल्म नहीं
तुम्हारे ये 'माय' कहना....
कितना मायने रखता है मेरे लिए
मानो एक पल में
दुनिया ख़ूबसूरत हो जाती है....
पता नहीं क्यों...
बस यूँ ही...
एक secret बता दूं तुम्हें?
तुम अज़ीज़ी से संवारो;
टूटती हूँ इसलिये
तुम मनाओ प्यार से मैं
रूठती हूँ इसलिये...
मैं रूठती हूँ इसलिये....
Sunday, January 10, 2010
आसमां के पार तुमको ले चलुंगा...
जगमगाती चांदनी को साथ में ले
होंठ पर एक फूल रक्खे और नयन में
जुगनुओं से ख़्वाब को सौगात में ले...
अर्श की दहलीज़ पर तुमसे मिलुंगा
आसमां के पार तुमको ले चलुंगा...
रागिनी और राग की आबाद दुनिया
तितलियों के पंख सी आज़ाद दुनिया
सब सितारे आ गए हैं प्रीत ले के
थरथराते लब पे ताज़े गीत ले के
है हवा बेताब देखो झूमने को
मखमली तलवे को तेरे चूमने को
चाँद लेके हार रस्ते पे खड़ा है
आ भी जाओ कि मुआं ज़िद्दी बड़ा है
कहकशां में गूंजती मल्हार सुन लो
नभ की छाती में धड़कता प्यार; सुन लो....
आओ भी अब रात सजदे में झुकी है
आओ भी कि सांस सीने में रुकी है
क्यूँ परेशां हो कि लौ ये बुझ न जाये
रौशनी से बात मेरी हो चुकी है...
लौ बुझी तो रास्तों पे मैं जलुंगा
आसमां के पार तुमको ले चलुंगा...
आसमां के पार तुमको ले चलुंगा.......
Monday, December 21, 2009
हार नहीं मानी है मैंने...
तो क्या जो सबसे नीचे हैं
तो क्या जो घुटना छिला है फिर
तो क्या जो 'ज़ीरो' मिला है फिर
तो क्या जो गुल्लक ख़ाली है
तो क्या जो रात बवाली है
तो क्या जो बहुत उधारी है
तो क्या जो शनि भी भारी है
तो क्या जो शेयर में लॉस हुआ
तो क्या जो ज़ालिम बॉस हुआ
तो क्या जो लड़की रूठी है
तो क्या जो क़िस्मत फूटी है
तो क्या जो नज़्म अधूरी है
तो क्या जो लाइफ भसूरी है...
इसी भसूरी में गिर-पड़ के; बढ़ने की ठानी है मैंने
हार नहीं मानी है मैंने; हार नहीं मानी है मैंने.....
तो क्या जो थोड़े रुके कदम
तो क्या जो थोड़ा झुके हैं हम
तो क्या जो लम्हे फिसले हैं
तो क्या जो हसरत छलनी है
तो क्या जो कंधा चोटिल है
तो क्या जो धुंधला साहिल है
तो क्या जो नब्ज़ है सुस्त पड़ी
तो क्या जो मंज़िल दूर खड़ी
तो क्या जो सपने टूट गये
तो क्या जो अपने छूट गये
तो क्या जो साँस है फूल रही
तो क्या जो राख़ में आग दबी
तो क्या जो थके इरादे हैं
तो क्या जो बिखरे वादे हैं
तो क्या जो मोच है धड़कन में
तो क्या जो घुटते मन-मन में
तो क्या जो दुनिया हंसती है
तो क्या जो छुपके रोते हैं
तो क्या जो ज़ोर कि मैं हारूं
तो क्या जो शोर कि मैं हारूं...
इसी शोर में जीत की धीमी; आहट पहचानी है मैंने
हार नहीं मानी है मैंने; हार नहीं मानी है मैंने.....
हार नहीं मानी है मैंने; हार नहीं मानी है मैंने.......
Wednesday, December 16, 2009
यू आर ए लूज़र.....
यही कहा था न तुमने मुझे,
जब आख़िरी बार मिली थी
और पलट के चली गयी थी
हमेशा के लिए...
'बयालीस सौ रुपये में महीना नहीं चलता'
'प्यार के सहारे ज़िन्दगी नहीं चलती'
और न जाने क्या क्या...
सब कुछ तो अब याद भी नहीं
आंखों के सामने अंधेरा जो छा गया था...
"यू आर ए लूज़र"...
गूंजती रहती थी ये बात मेरे कानों में
कई दिन बस रोता रहा था...
कई रात नींद नहीं आयी...
हर आहट पे चौंक पड़ता था;
कि शायद तुम वापस आ गयी हो
हर वक़्त मोबाइल को एकटक देखता था,
कि कहीं तुम्हारा कोई SMS तो नहीं...
शराब की लत भी उन्हीं दिनों लगी थी
जितना पीता था;
तुम और ज़्यादा याद आती थी...
"यू आर ए लूज़र"...
पता नहीं कब ये चोट इरादे में बदलने लगी
मोहब्बत के ज़ख्म को तो वक़्त ने भर दिया
मगर ज़मीर का घाव...
उसका क्या?
नासूर बन गया वो
गहरा लाल, फिर काला
और इस नासूर की तरह
मेरा रंग भी बदल रहा था...
गहरा, ज़िद्दी रंग...
एक एक कर सब बिखरे तिनके समेटे मैंने...
एक एक कर मंज़िलों को हासिल करता गया...
एक एक कर सब हिसाब जो लेना था तुमसे...
"यू आर ए लूज़र"...
ये एक कर्ज़ है तुम्हारा मुझपे
ज़रूर आऊंगा चुकाने एक दिन...
सुना है तुम दो बस बदल के ऑफिस जाती हो
अठारह रुपये का टिकट लेके...
भीड़ में धक्के खाते हुए...
वैसे मैंने हौंडा सिटी खरीद ली है
दो फ्लैट भी बुक करा लिये हैं,
और हाँ
'बयालीस सौ रुपये' मेरे ड्राईवर की पगार है...
ना ना
पैसे की धौंस नहीं दे रहा
खेल के नियम तो तुम्हारे बनाये हुये हैं
मैंने तो केवल ये खेल खेला है
तुम तो मुझसे ही खेल गयी थी...
किसी दिन मिलना है तुमसे...
बहाने से... इत्तेफाक़न....
तुम्हारे नेहरू प्लेस के बस स्टॉप पर
घूरना है तुम्हारी आंखों में
देर तक....
और पूछना है.....
"हू इज़ ए लूज़र"...........
Tuesday, December 1, 2009
वो ग़ज़ल कहां की ग़ज़ल हुय़ी....
ग़र सुख़न के तलवे अंगारों पर जले नहीं
ग़र कंठ शेर का नीला हो ना विष पी के
ग़र हर्फ़ की पीड़ा सुनके मुर्दा ना चीखे
ग़र मतला दर्द में पागल होके ना झूमे
ग़र मक़ता घाव की पपड़ी को जा ना चूमे
ग़र शिकन से ज़ख़्मी ना रदीफ़ का भाल हुआ
ग़र रंग काफ़िये का ना थोड़ा लाल हुआ
ग़र बहर की साँसों में दौड़े ललकार नहीं
ग़र ग़ज़ल के सीने में नंगी तलवार नहीं....
तो ग़ज़ल कहां की ग़ज़ल हुयी
वो ग़ज़ल कहां की ग़ज़ल हुयी.....
Wednesday, November 25, 2009
थोड़े प्यार की थोड़ी खुशियाँ (एक गीत)
थोड़े दिन से मैं; फ़िरूँ बावली...
थोड़ी दूरियां; थोड़े फ़ासले
थोड़ा तुम चले; थोड़ा मैं चली...
थोड़े बेख़बर; थोड़े बेफ़िक़र
मेरे ख़्वाब हैं; थोड़े रतजगे...
थोड़ा सोचती; थोड़ा जानती
थोड़ा चाँद क्यों; अच्छा लगे...
थोड़ा चाँद क्यों; अच्छा लगे...
वक़्त से मांगे थोड़े लम्हे, जीने दो; मत रोको ना...
थोड़े प्यार की थोड़ी खुशियाँ, पीने दो; मत रोको ना...
थोड़ी गुनगुनी; सी धूप को
थोड़ा गुनगुनाते; मैं चलूँ...
थोड़ी गुदगुदी; मेरे दिल में क्यों
शाम-ओ-सहर; थोड़ा मैं जलूं...
ये खिड़कियाँ; थोड़ी खोल दो
'चांदनी'; थोड़ा छू मुझे...
थोड़ा जी सकूं; थोड़ा मर मिटूं
थोड़ा प्यार कर; तू यूँ मुझे...
थोड़ा प्यार कर; तू यूँ मुझे...
दिन के ज़ख्मों को रातों को, सीने दो; मत रोको ना...
थोड़े प्यार की थोड़ी खुशियाँ, पीने दो; मत रोको ना...
थोड़े प्यार की थोड़ी खुशियाँ, पीने दो; मत रोको ना...
Sunday, November 22, 2009
इक दिन मेरे गीत....
इक दिन भोर की किरणें भी मेरे गीतों को गायेंगी
इक दिन सूरज सांझ ढले इनको सुनके सुस्तायेगा।
इक दिन रात की कॉपी में होंगे मेरे ही गीत लिखे
इक दिन मौसम आँख चुरा इन गीतों को दोहरायेगा॥
इक दिन मेरे गीत रुतों के राज़-ए-उल्फ़त खोलेंगे
इक दिन मेरे गीत नशा बनके सर चढ़के बोलेंगे...
इक दिन मेरे गीत ग़ज़ल बनके महफ़िल में गूंजेंगे
इक दिन लोरी बन बच्चों के गालों को सहलायेंगे।
इक दिन लावारिस साजों को गीत मेरे ही छत देंगे
इक दिन ठुमरी बन कोठों पे ठाकुर को बहलायेंगे॥
इक दिन सातों सुर बेसुध हो इन गीतों संग हो लेंगे
इक दिन मेरे गीत नशा बनके सर चढ़के बोलेंगे...
इक दिन मेरे गीत बावरे तुम तक भी जा पहुंचेंगे
इक दिन तुमको इनमें अपनी खुशबू भी आ जायेगी।
इक दिन आधी रात को तुम गीतों से प्यास बुझा लेना
इक दिन आधे ख़्वाब इन्हीं गीतों से पास बुलायेगी॥
इक दिन थके इरादे इनको रख सिरहाने सो लेंगे
इक दिन इन गीतों को सुन तुम हंस लेना हम रो लेंगे
इक दिन मेरे गीत नशा बनके सर चढ़के बोलेंगे...
इक दिन मेरे गीत नशा बनके सर चढ़के बोलेंगे...
Thursday, November 19, 2009
दर्द का ये जश्न है.....
एक पागल रात में
ख़्वाब में था आ गया
घंटों खड़ा आकाश को
एकटक तकता रहा
और अचानक हंस पड़ा
फिर गालियां बकने लगा
अर्श की दीवार पर
खून से लिखने लगा
वो शरीक-ए-जश्न हों
हाँ वो शरीक-ए-जश्न हों
जिसने धोखे खाये हों
रूह जिसकी लुट गयी
और ठरक की सेज़ पर
जिसकी सांसें घुट गयी
पंख जिसके खो गये
हाथ जिसके कट गये
जो ख़राशों में पले
प्यार से महरूम हों
ज़ख्म है जिसकी बहन
आयें वो बलवाई सब
और फ़िज़ा-ए-दर्द में
एक कतरा रूह दें
एक कतरा रूह दें...
आग सी फैली ख़बर
सुन के मुर्दे जी गये
ज़िन्दगी और मौत को
साथ रख कर पी गये
इंकलाबी आ गये
बेड़ियों को तोड़ कर
हाथ में परचम लिये
आंख में शोले लिये
दांत में हड्डी लिये
जीभ को उलटी किये
'आ गयी' मैं 'आ गया'
हर दिशा से शोर था
रास्ते खुद चल पड़े
चल पड़ी पगडंडियाँ
और दलालों से झगड़कर
मंडियों की रंडियां
मुट्ठियों को भींच कर
चीखती थीं बारहा
जाविदा ये रस्म हो
जाविदा ये साज़ हो
जाविदा इस साज़ पर
दर्द की आवाज़ हो
दर्द का ये जश्न है
दर्द का ये जश्न है
हाँ दर्द का ये जश्न है
दर्द का ये जश्न है....
Thursday, September 10, 2009
कैसे लिपटी रात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में.....
रख आया है शायर सब जज़्बात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में
तुम ही कहो ना, कैसे लिपटी रात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में ॥
चाँद की चोटी, धूप के गजरे; बंधे 'रिबन' से शाम के नखरे
लटों में उलझी कुदरत की सौगात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में
तुम ही कहो ना, कैसे लिपटी रात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में ॥
हल्की बूँदें, रात अंधेरी; मद्धम धुन पर, चलती गाड़ी
नज़र मिली उफ़्फ़... 'मेरा बांया हाथ' तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में
तुम ही कहो ना, कैसे लिपटी रात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में ॥
ज़ुल्फ बादल, ज़ुल्फ झरना; ज़ुल्फ बोली, 'प्यार कर ना'
थिरकी उंगली और ठहरे लम्हात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में
तुम ही कहो ना, कैसे लिपटी रात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में ॥
ज़ुल्फ बिछाओ, सोयेंगे हम; ज़ुल्फ में छुपकर रोयेंगे हम
सावन देखे बिन बादल बरसात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में
तुम ही कहो ना, कैसे लिपटी रात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में ॥
तुम ही कहो ना, कैसे लिपटी रात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में......
Friday, August 21, 2009
अभी तो मुठ्ठी खोली है मां....
ज़ख्म हरे हैं रहने दो; अपनी शर्तों पे जीने दो
पंख बड़े बेचैन हैं कब से, अब आकाश में उड़ने दो
नर्म कलाई फंस पंजों में; मुड़ती है तो मुड़ने दो
मुझमें जो पगली रहती वो नींद में अक्सर बोली है मां
अभी मेरी ऊँगली ना पकडो, अभी तो मुठ्ठी खोली है मां...
रात को रौंदूं, गगन से उलझूं, तेज़ हवा को मसलूंगी
ज़हर भरा है लहू में मेरे, भाग सपेरे; डस लूंगी
मैं कोयल की कूक नहीं, मैं आग लिये फुफकार रही हूँ
हीरे मोती सब नकली मैं ख़ुद अपना सृंगार रही हूँ
रस्में कसमें तोड़ ये चुनरी खूं से आज भिगो ली है मां
अभी मेरी ऊँगली ना पकडो, अभी तो मुठ्ठी खोली है मां...
ना मैं सीता, ना मैं मीरा; अपनी अलग कहानी है मां
ना आँचल में दूध मेरे और ना आंखों में पानी है मां
सिके सही सुर, गाने दो ना; रूह उक़ाबी मचल रही है
लाल, बैंगनी, काली, पीली, मुझमें कोई रंग बदल रही है
बागी रंग आज़ाद हुए अब बुरा न मानो होली है मां
अभी मेरी ऊँगली ना पकडो, अभी तो मुठ्ठी खोली है मां...
Monday, July 27, 2009
मैं तुझमें छुपकर गाऊँगा....
कतरा कतरा दूर हुए वो, लम्हों की झिलमिल सौगातें।
ये रात, बात, सौगात सभी; हम दोनों में ही शामिल हैं....
जब छेडेंगे ये साज़ कभी, मैं आंखों से मुस्काउंगा
तुम मुझमें छुपकर हंस लेना, मैं तुझमें छुपकर गाऊंगा॥
आंसू, गुस्सा, शिकवे, तेवर; क्या इल्जाम हो इस दुनिया पर
तुम भी सच्ची, मैं भी सच्चा; वादा और विश्वास अमर
जब थोड़ा सा वक्त मिले तो मूँद के अपनी आंखों को....
मेरे चेहरे को पढ़ लेना, मैं लफ्ज़ नहीं दे पाउँगा
तुम मुझमें छुपकर हंस लेना, मैं तुझमें छुपकर गाऊंगा॥
क्यों तितली के पर छिलते हैं, क्यों इतने कम पल मिलते हैं
इस 'क्यों' के ज़ख्मों को हम तुम, आओ मिलजुल कर सिलते हैं
तुम धरती हो, मैं अम्बर हूँ; अपने रिश्ते का नाम नहीं....
पर जब भी बूँदें चाहोगी, मैं बादल बनकर आउंगा
तुम मुझमें छुपकर हंस लेना, मैं तुझमें छुपकर गाऊंगा॥
तुम मुझमें छुपकर हंस लेना, मैं तुझमें छुपकर गाऊंगा॥
Saturday, February 14, 2009
फिर से कर ले प्यार, चल बिंदास हो जा...
फिर से कर ले प्यार, चल बिंदास हो जा
फूल कुम्हलाये तो क्या; गीत मुरझाये तो क्या
पीर मोती बनके ये, आँख छलकाए तो क्या
सूजी पलकों को छुअन से गुदगुदाने
इस दफा भी मीत ना आए तो क्या
तुझको रोता देख बासंती हवा ने
छेड़ दी मल्हार; चल बिंदास हो जा
फिर से कर ले प्यार; चल बिंदास हो जा
घुट के यूँ मरना मना है, प्यार से डरना मना है
दर्द के सिक्कों को चुनके, जेब में भरना मना है
अधखुली इन खिड़कियों की सुन सदायें
ये भी कहतीं शोक अब करना मना है
माज़ी के गोदाम में कब तक चलेगा
क़र्ज़ का व्यापार, चल बिंदास हो जा
फिर से कर ले प्यार, चल बिंदास हो जा
खोल दे फिर दिल का दर, इक दफ़ा फिर इश्क कर
क्या पता 'कैक्टस' के पीछे छुप रहा हो गुलमोहर
जा गले मिल, इश्क का ये ईद है
फूल फिर महकेंगे कहता है सहर
उठ, नए कपड़े पहन, फिर सज रहा है
इश्क का बाज़ार, चल बिंदास हो जा
फिर से कर ले प्यार, चल बिंदास हो जा
फिर से कर ले प्यार, चल बिंदास हो जा....
Sunday, February 1, 2009
आओ रात को पागल कर दें....
आओ रात को पागल कर दें
रात शुरू तो बात शुरू
'याहू' और 'गूगल' साथ शुरू
फिर 'मेल' शुरू और खेल शुरू
भूले बिसरे जज़्बात शुरू
टिपटिप टकटक 'चैट' पे बातें
सरगोशी से 'फ्लैट' पे बातें
क्या खाया तुम कहाँ थे दिन भर
बेतुकी 'दिस दैट' की बातें
रेत खेत माझी की बातें
'फ्यूचर' और 'माज़ी' की बातें
नग्में, सोहरे, क्लासिक, लोरी
'अम्मी' और 'माँ जी' की बातें
बैठ के बातें; सो के बातें
हंस के बातें; रो के बातें
सरपट सरपट दौडी बातें
क्यों रोके क्यों रोके बातें ?
बात बहारें; बात फुहारें
बात बुलाएं; बात पुकारें
बात में शबनम; बात में खुशबू
बात रुलाएं; बात दुलारें
बात में सावन; बात में बरखा
आओ बात को बादल कर दें
एक हम पागल एक तुम पागल
आओ रात को पागल कर दें
तीखी खट्टी इमली जैसी
चार सौ चालीस बिजली जैसी
रंग बिरंगी फुदक रही है
देखो बातें तितली जैसी
घंटी की टनटन सी बातें
चूडी की खनखन सी बातें
धकधकधकधक धकधकधकधक
है चलती धड़कन सी बातें
लैला मजनू हीर की बातें
गालिब फैज़-ओ-मीर की बातें
कुछ छोटे किस्से 'ऑफिस' के
कुछ फूटी तकदीर की बातें
जेवर वाली; तेवर वाली
शक्कर मिसरी घेवर वाली
चुटकी लेती अल्हड़ बातें
मानों भाभी देवर वाली
कुछ उजली कुछ काली बातें
लगती मीठी गाली बातें
चाँद सड़क से डांट रहा है
'बातें बातें खाली बातें'
कान पकड़ लें चाँद का आओ
तारों में हम हलचल कर दें
एक हम पागल एक तुम पागल
आओ रात को पागल कर दें
शाम की बातें; जाम की बातें
शहर में बढ़ते दाम की बातें
थोड़ी काली मिर्च छिड़क कर
उस काफिर गुमनाम की बातें
रांची और रतलाम की बातें
'क्या होगा अंजाम' की बातें
हौले से वो आहें भर के
उस शायर बदनाम की बातें
धुंधली सी कोई शाम की बातें
ढेरों ऐश-ओ-आराम की बातें
धूप से आकर पानी क्यों पी ?
खांसी सरदर्द जुकाम की बातें
महुआ, सरसों, आम की बातें
'बॉलीवुड' 'खैय्याम' की बातें
बगिया, जामुन, 'सिस्टम', रिश्ते
और कुछ कुछ फिर काम की बातें
राधा, मीरा, श्याम की बातें
मिथिला, सीता राम की बातें
इस बक बक में तीरथ; इन
बातों में चारों धाम की बातें
बात को काबा; बात को कासी
बात को इस गंगाजल कर दें
एक हम पागल एक तुम पागल
आओ रात को पागल कर दें
कपड़े, शौपिंग, खर्च की बातें
याहू, गूगल सर्च की बातें
चुगली, शिकवा, तंज़-ओ-नखरे
मैखाने और चर्च की बातें
गहरी बातें; सस्ती बातें
चूर नशे में मस्ती बातें
इठलाती शर्माती पगली
गौर से देखो; हंसती बातें
सूनापन, आकाश की बातें
चलती जाए काश के बातें
बकबकबकबक बकबकबकबक
बक झक और बकवास की बातें
'ह्यूमर' कुछ जज़्बात की बातें
जज़्बात से निकली बात की बातें
दिल से बातें; दिल की बातें
दिन की बातें; रात की बातें
अब इन सौतन रातों का क्या
और इन रिश्ते नातों का क्या
छोड़ो बेकार की बातों को
बातें हैं; इन बातों का क्या !!!
पर बची खुची इन बातों से ही
अजड़ अमर ये कुछ पल कर दें
एक हम पागल एक तुम पागल
आओ रात को पागल कर दें
एक हम पागल एक तुम पागल
आओ रात को पागल कर दें
Thursday, January 29, 2009
नैना सांवरे के.... (एक गीत)
नैना सांवरे के; दिल लिए जाए
काहे सताए बालम; रतियन जगाये
कंगना ना मांगू राजा
गजरा ना चाहूँ; आजा
तकत तकत थक गए नैना
काटु न कटे ये जुलमी रैना
अरज हमारी सैय्यां; काहे नाहिं माने.....
नैना सांवरे के; दिल लिए जाए
काहे सताए बालम; रतियन जगाये
दरपन ना भाये पिया
सखियां सताए पिया
छलक छलक जब मेघा बरसे
बिरहा अगन में ये जिया तरसे
दरद कलेजवा में; लागे सुस्ताने.....
नैना सांवरे के; दिल लिए जाए
काहे सताए बालम; रतियन जगाये
सदियों की प्यासी मीरा
चरणों की दासी मीरा
जनम जनम से मैं तोहरी पिया
मोल करो न मारे जोहरी पिया
बासी नज़र पे वारी, पीतम सयाने......
अंखियन की भासा काहे; नाहिं पहचाने......
नैना सांवरे के; दिल लिए जाए
काहे सताए बालम; रतियन जगाये......
Friday, December 26, 2008
कुछ यूँ भी तो सीखें !!!
'क' से 'कंगन' , 'ख' से 'खन-खन'
'ग' से 'गजरे' बालों पे
'घ' से 'घर' छूटा मेरी जां
फूल खिले जब डालों पे।
'च' से 'चंदा', 'छ' से 'छत पर
'ज' से 'जब' जब आए है
'झरने' की 'झंकार' सी 'झ' से
छुप छुप के मुस्काये है।
'ट' से 'टूटा' एक सितारा
'ठ' से 'ठुमरी' हंसना तेरा
'ड' से 'डाली' झूलों वाली
'ढ' से 'ढूंढो' चैन बसेरा।
'त' से 'तुम' जब भी दिखती हो
दिल 'थ' से क्यों 'थम' सा जाए
'द' से 'दिल' में दर्द बहुत है
'ध' - 'न' साथ तो 'धड़कन' हाय।
नशे में डूबी 'प' से 'पलकें'
'फ' से 'फूलों' वाली खुशबू
'ब' - 'बाहर' और 'भ' से 'भीतर'
'म' से 'मुझ' पर तेरा जादू।
'य' - 'र' से 'या' 'रब' सुन ले तू
'ल' से 'लाल' लबों की लाली
सब कुछ भूले, भुला न पाये
'व' से 'वो' कलकत्ते वाली।
'श' से इतना 'शोर शराबा'
'स' से 'सागर' सरहद सरगम
'ह' से 'हाल-ऐ-दिल' तो यही है
कुछ तुम सीखो, कुछ सीखें हम।
'ह' से 'हाल-ऐ-दिल' तो यही है
कुछ तुम सीखो, कुछ सीखें हम।
Monday, December 15, 2008
तुम्हारे बाद.....
तुम्हारे बाद मुझको रेशमी आँचल नहीं भाता
तुम्हारे बाद ये सारी फ़िज़ा रूठी सी है मुझसे
तुम्हारे बाद अब बाद - ए - सबा भी घर नहीं आती
'माँ' कह रही थी अब मैं रहता चिडचिडा सा हूँ
तुम्हारे बाद मुझको नींद जो अक्सर नहीं आती
कमीनी चांदनी भी 'दर' से मेरे लौट जाती है
वो मीठे ख़्वाब भी अब रात को दस्तक नहीं देते
दिलों के सब चरागाँ हर पहर गुमसुम से रहते हैं
वो जुगनू भी मुझे अब रौशनी का हक नहीं देते
जुगनू, रौशनी, सूरज नहीं; बादल नहीं भाता
तुम्हारे बाद मुझको रेशमी आँचल नहीं भाता.......
तुम्हारे बाद के सावन मेरी आंखों में चुभते हैं
वो रिमझिम सी झडी ट्रैफिक का मुझको 'शोर' लगती हैं
तुम्हारे बाद वो जज़्बात मानो मर गए सारे
उबाऊ हो गए नगमें ; फिल्में बोर लगती हैं
तुम्हारे बाद सारी रुत यहाँ पर अनमनी सी है
तुम्हारे बाद 'बासंती हवा' रुक रुक के चलती है
तुम्हारे बाद अब मैं 'जून' में जल्दी नहीं उठता
तुम्हारे बाद जाड़े की हसीं वो रात खलती है
ठिठुरता जा रहा हूँ, पर मुझे कम्बल नहीं भाता
तुम्हारे बाद मुझको रेशमी आँचल नहीं भाता
किसी की ज़ुल्फ को अब मैं कहाँ आकाश लिखता हूँ
किसी की झील सी आंखों पे कब मैं हक जताता हूँ
कहीं भूले से जो 'अहबाब' तेरा ज़िक्र गर छेड़ें
किसी टूटे हुए पुल सा मैं मानो थरथराता हूँ
बहर है, काफिया भी है; रदीफ़ - ओ - शेर भी कायम
पर फिर भी कुछ कम है जो इनमें 'तू' नहीं आती
मेरी ग़ज़लों में बाकी अब तलक संजीदगी तो है
मेरे गीतों से तेरे जिस्म की खुशबू नहीं आती
के खुशबू से सजी यादों का वो जंगल नहीं भाता
तुम्हारे बाद मुझको रेशमी आँचल नहीं भाता
तुम्हारे बाद मुझको रेशमी आँचल नहीं भाता