वक़्त की क़ैद में; ज़िन्दगी है मगर... चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं....

Friday, October 9, 2009

ख़्वाब मेरे दीवाने निकले....

ख़्वाब मेरे दीवाने निकले
तूफाँ से टकराने निकले

तोड़ के सिग्नल; मनमौजी से
गीत मिलन के गाने निकले

सलवट करवट छोड़ के सारे
तुझ संग रात बिताने निकले

मेरे तेरे ख़्वाब जुड़े तो
बेसिर-पैर फ़साने निकले

हाथ समझ कर जिनको थामा
वो केवल दस्ताने निकले

खुशी का घर नीलाम हो गया
ग़म के कई ठिकाने निकले

नींद से खटपट तब से मानो
तारे हमें सताने निकले

उनसे बिछड़े मुद्दत गुज़री
आ के कई ज़माने निकले

फिर यादों के पतझड़ में क्यों
फूल मेरे सिरहाने निकले.......

Monday, October 5, 2009

शराब में बुराई क्या है...

बेवफ़ा कौन है यहाँ; बा-वफ़ाई क्या है ?
बहुत मुश्किल है समझना; 'सच्चाई' क्या है ?

जब दर्द ही सुकून दे और सुकूँ मीठा दर्द दे
चारागर ! भला इस मर्ज़ की दवाई क्या है ?

सवाल ये नहीं कि मोहब्बत की पगार कितनी है
सवाल ये है कि 'उपरी कमाई' क्या है ?

इंतज़ार, इज़हार, इबादत; सब तो किया है मैंने
और कैसे जताऊं; इश्क की गहराई क्या है ?

वो गंगाजल से पाक़ है जो पी के 'काफ़िर' सच कहे
होश में बताओ; शराब में बुराई क्या है ?

आंखों की गोद से निकले तो ता-उम्र यतीम रहे
उन आंसुओं से सुनिए; 'माँ से जुदाई' क्या है ?

Wednesday, September 23, 2009

गीत को मेरे, तेरी आवाज़ भी तो चाहिये....

दर्द को इन धड़कनों का साज़ भी तो चाहिये
गीत को मेरे, तेरी आवाज़ भी तो चाहिये

सिर्फ़ दौलत के सहारे 'ताज' कब बनते मियां
सरफिरों में कुछ ग़म-ए-मुमताज़ भी तो चाहिये

हुस्न की रानाईयां सब कुछ नहीं है गुलबदन
दिल को छूने के लिए; "अंदाज़" भी तो चाहिये

पंख के ज़ख्मों की टीसें; यूं तो थोडी कम सी है
उड़ने को पर हसरत-ए-परवाज़ भी तो चाहिये

जाम छलकाने फ़क़त से महफ़िलें सजती नहीं
दमसाज़ भी तो चाहिये; दिलनाज़ भी तो चाहिये

गीत को मेरे, तेरी आवाज़ भी तो चाहिये...

Thursday, September 10, 2009

कैसे लिपटी रात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में.....

परी के किस्से, ग़ज़ल की खुशबू; लहर की थपकी, सहर का जादू
रख आया है शायर सब जज़्बात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में
तुम ही कहो ना, कैसे लिपटी रात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में ॥

चाँद की चोटी, धूप के गजरे; बंधे 'रिबन' से शाम के नखरे
लटों में उलझी कुदरत की सौगात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में
तुम ही कहो ना, कैसे लिपटी रात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में ॥

हल्की बूँदें, रात अंधेरी; मद्धम धुन पर, चलती गाड़ी
नज़र मिली उफ़्फ़... 'मेरा बांया हाथ' तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में
तुम ही कहो ना, कैसे लिपटी रात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में ॥

ज़ुल्फ बादल, ज़ुल्फ झरना; ज़ुल्फ बोली, 'प्यार कर ना'
थिरकी उंगली और ठहरे लम्हात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में
तुम ही कहो ना, कैसे लिपटी रात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में ॥

ज़ुल्फ बिछाओ, सोयेंगे हम; ज़ुल्फ में छुपकर रोयेंगे हम
सावन देखे बिन बादल बरसात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में
तुम ही कहो ना, कैसे लिपटी रात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में ॥

तुम ही कहो ना, कैसे लिपटी रात तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में......

Monday, August 31, 2009

आज कोई लाश ज़िंदा रह न जाए....

देखना तुम चीख धीमी रह न जाये
हौसलों की ये इमारत ढह न जाये

रूह है बेदार अब इस ज़ुल्म को
दे अहिंसा की दलीलें; सह न जाये

कैंचियों से काट दो गुलदाउदी को
पीढियां तुझको 'नरम-दिल' कह न जाये

आँख क्या अब थूक में भी खून हो
आज कोई लाश ज़िंदा रह न जाये

दिल तुम्हारा बागियों की फौज सा
'चूडियों-अंगड़ाईयों' में बह न जाये

Thursday, August 27, 2009

ज़ख्म बहुत गहरा है शायद.....

हमने उसकी आँखें पढ़ ली; छुपा कोई चेहरा है शायद
वो हर बात पे हंस देती है; ज़ख्म बहुत गहरा है शायद॥

गुमसुम यादें; घायल माज़ी*, सालों से हैं सखियां उसकी
कच्ची नींद उचट जाती है; ख़्वाबों पे पहरा है शायद॥

शहर जला क्यों घर बिखरा; पगली आकाश से पूछ रही है
कौन उसे जा कर समझाए; आसमान बहरा है शायद॥

सारी उलझन, सब बेचैनी, और जो धुंधला-धुंधला ग़म है
आंसू बन के बह जाने दो; पलकों पे ठहरा है शायद॥

वो हर बात पे हंस देती है; ज़ख्म बहुत गहरा है शायद....

*माज़ी = Past

Friday, August 21, 2009

अभी तो मुठ्ठी खोली है मां....

मैं सदियों की प्यासी हूँ; मां मुझको दरिया पीने दो
ज़ख्म हरे हैं रहने दो; अपनी शर्तों पे जीने दो
पंख बड़े बेचैन हैं कब से, अब आकाश में उड़ने दो
नर्म कलाई फंस पंजों में; मुड़ती है तो मुड़ने दो
मुझमें जो पगली रहती वो नींद में अक्सर बोली है मां
अभी मेरी ऊँगली ना पकडो, अभी तो मुठ्ठी खोली है मां...

रात को रौंदूं, गगन से उलझूं, तेज़ हवा को मसलूंगी
ज़हर भरा है लहू में मेरे, भाग सपेरे; डस लूंगी
मैं कोयल की कूक नहीं, मैं आग लिये फुफकार रही हूँ
हीरे मोती सब नकली मैं ख़ुद अपना सृंगार रही हूँ
रस्में कसमें तोड़ ये चुनरी खूं से आज भिगो ली है मां
अभी मेरी ऊँगली ना पकडो, अभी तो मुठ्ठी खोली है मां...

ना मैं सीता, ना मैं मीरा; अपनी अलग कहानी है मां
ना आँचल में दूध मेरे और ना आंखों में पानी है मां
सिके सही सुर, गाने दो ना; रूह उक़ाबी मचल रही है
लाल, बैंगनी, काली, पीली, मुझमें कोई रंग बदल रही है
बागी रंग आज़ाद हुए अब बुरा न मानो होली है मां
अभी मेरी ऊँगली ना पकडो, अभी तो मुठ्ठी खोली है मां...