किसी की शायरी पढ़ के जो तुम छाये तो क्या छाये
मुगन्नी* उस अधूरे गीत को गाये तो क्या गाये॥
अमीरी रंग-ओ-रौनक ले के जलसे में चली आई
गरीबी देखती, फिर सोचती, जाये तो क्या जाये॥
वो बच्ची पिछली कुछ रातों से पानी पी के सोती है
हवेली चुन रही है, व्रत के दिन, खाये तो क्या खाये॥
हमें ये फ़क्र कि हम हक़ से तारे तोड़ लाते हैं
जो सूरज मांग कर आकाश से लाये तो क्या लाये॥
चराग़-ए-इश्क लड़ के बुझ गया; तब नींद से जागे
हमारे दिल पे दस्तक दी तो क्या, आये तो क्या आये॥
*मुगन्नी = गायक
Sunday, August 9, 2009
Thursday, July 30, 2009
मनाली की वो रात....
नींद में वादी मचल रही थी
धड़कन थम थम के चल रही थी।
सुला के कलियों को फूलों को
खुनक हवाएं टहल रही थी।
किरणें ओस की बूँदें पी के
आसमान से फिसल रही थी।
चाँद मनचला झाँक रहा था
चांदनी कपड़े बदल रही थी।
रूम के बाहर बर्फ जमी थी
और वो अन्दर पिघल रही थी।
उस रात मनाली के सीने में
गूँज पुरानी ग़ज़ल रही थी।
धड़कन थम थम के चल रही थी।
सुला के कलियों को फूलों को
खुनक हवाएं टहल रही थी।
किरणें ओस की बूँदें पी के
आसमान से फिसल रही थी।
चाँद मनचला झाँक रहा था
चांदनी कपड़े बदल रही थी।
रूम के बाहर बर्फ जमी थी
और वो अन्दर पिघल रही थी।
उस रात मनाली के सीने में
गूँज पुरानी ग़ज़ल रही थी।
Monday, July 27, 2009
मैं तुझमें छुपकर गाऊँगा....
कितने किस्से, कितनी बातें, महका दिन था, जगमग रातें
कतरा कतरा दूर हुए वो, लम्हों की झिलमिल सौगातें।
ये रात, बात, सौगात सभी; हम दोनों में ही शामिल हैं....
जब छेडेंगे ये साज़ कभी, मैं आंखों से मुस्काउंगा
तुम मुझमें छुपकर हंस लेना, मैं तुझमें छुपकर गाऊंगा॥
आंसू, गुस्सा, शिकवे, तेवर; क्या इल्जाम हो इस दुनिया पर
तुम भी सच्ची, मैं भी सच्चा; वादा और विश्वास अमर
जब थोड़ा सा वक्त मिले तो मूँद के अपनी आंखों को....
मेरे चेहरे को पढ़ लेना, मैं लफ्ज़ नहीं दे पाउँगा
तुम मुझमें छुपकर हंस लेना, मैं तुझमें छुपकर गाऊंगा॥
क्यों तितली के पर छिलते हैं, क्यों इतने कम पल मिलते हैं
इस 'क्यों' के ज़ख्मों को हम तुम, आओ मिलजुल कर सिलते हैं
तुम धरती हो, मैं अम्बर हूँ; अपने रिश्ते का नाम नहीं....
पर जब भी बूँदें चाहोगी, मैं बादल बनकर आउंगा
तुम मुझमें छुपकर हंस लेना, मैं तुझमें छुपकर गाऊंगा॥
तुम मुझमें छुपकर हंस लेना, मैं तुझमें छुपकर गाऊंगा॥
कतरा कतरा दूर हुए वो, लम्हों की झिलमिल सौगातें।
ये रात, बात, सौगात सभी; हम दोनों में ही शामिल हैं....
जब छेडेंगे ये साज़ कभी, मैं आंखों से मुस्काउंगा
तुम मुझमें छुपकर हंस लेना, मैं तुझमें छुपकर गाऊंगा॥
आंसू, गुस्सा, शिकवे, तेवर; क्या इल्जाम हो इस दुनिया पर
तुम भी सच्ची, मैं भी सच्चा; वादा और विश्वास अमर
जब थोड़ा सा वक्त मिले तो मूँद के अपनी आंखों को....
मेरे चेहरे को पढ़ लेना, मैं लफ्ज़ नहीं दे पाउँगा
तुम मुझमें छुपकर हंस लेना, मैं तुझमें छुपकर गाऊंगा॥
क्यों तितली के पर छिलते हैं, क्यों इतने कम पल मिलते हैं
इस 'क्यों' के ज़ख्मों को हम तुम, आओ मिलजुल कर सिलते हैं
तुम धरती हो, मैं अम्बर हूँ; अपने रिश्ते का नाम नहीं....
पर जब भी बूँदें चाहोगी, मैं बादल बनकर आउंगा
तुम मुझमें छुपकर हंस लेना, मैं तुझमें छुपकर गाऊंगा॥
तुम मुझमें छुपकर हंस लेना, मैं तुझमें छुपकर गाऊंगा॥
Friday, July 17, 2009
चलता पुर्जा शायर है, गुलज़ार नहीं है
खूं तो अब भी लाल है, रफ़्तार नहीं है
'काफ़िर' तेरी ग़ज़लों में अब धार नहीं है॥
बंद करके ख़ुद ही सारी खिड़कियाँ वो
बोलते हैं घर ये हवादार नहीं है॥
शोहरों के नकाब में ना मर्सिया चलें
शहर में ऐसा कोई त्योहार नहीं है॥
उसूलों की लिबास जला डालिए हुज़ूर
अब पाँच साल आपकी सरकार नहीं है॥
ये क्या नए जुड़े तो पिछले छूटते गए
मोहब्बत इक किताब है, अख़बार नहीं है॥
***सीधा सादा आदमी है, सीधी बात कहे
चलता पुर्जा शायर है, गुलज़ार नहीं है ***
'काफ़िर' तेरी ग़ज़लों में अब धार नहीं है॥
बंद करके ख़ुद ही सारी खिड़कियाँ वो
बोलते हैं घर ये हवादार नहीं है॥
शोहरों के नकाब में ना मर्सिया चलें
शहर में ऐसा कोई त्योहार नहीं है॥
उसूलों की लिबास जला डालिए हुज़ूर
अब पाँच साल आपकी सरकार नहीं है॥
ये क्या नए जुड़े तो पिछले छूटते गए
मोहब्बत इक किताब है, अख़बार नहीं है॥
***सीधा सादा आदमी है, सीधी बात कहे
चलता पुर्जा शायर है, गुलज़ार नहीं है ***
Wednesday, July 1, 2009
ऐतवार को दिन में भी हम सो लेते हैं....
ज़मीं है बंजर; फिर भी सपने बो लेते हैं
जो भी प्यार से मिले, उसी के हो लेते हैं॥
आंखों के दरवाज़े पे बेताब खड़े हैं
अश्कों को आज़ाद करें, चल रो लेते हैं॥
जब अक्सर वो ख़्वाबों में आने लगते हैं
ऐतवार को दिन में भी हम सो लेते हैं॥
उलट उलट के ग़म के मौजे कब तक पहनें
साबुन-सर्फ़ से घिसके इनको धो लेते हैं॥
मैखाने से तौबा कर ली हमने साक़ी
हाँ, महफ़िल में तारे नाचें, तो लेते हैं॥
जो भी प्यार से मिले, उसी के हो लेते हैं॥
आंखों के दरवाज़े पे बेताब खड़े हैं
अश्कों को आज़ाद करें, चल रो लेते हैं॥
जब अक्सर वो ख़्वाबों में आने लगते हैं
ऐतवार को दिन में भी हम सो लेते हैं॥
उलट उलट के ग़म के मौजे कब तक पहनें
साबुन-सर्फ़ से घिसके इनको धो लेते हैं॥
मैखाने से तौबा कर ली हमने साक़ी
हाँ, महफ़िल में तारे नाचें, तो लेते हैं॥
Wednesday, June 24, 2009
अब चाँद तो लाना पड़ेगा ठाकुर...
पायल, गहने, झुमके, गजरे; सब जुर्माना पडेगा ठाकुर
फिर भी गुड़िया रूठी है, अब चाँद तो लाना पड़ेगा ठाकुर॥
हुस्न कटोरी, इश्क का चमचा; चख ली तूने ढेर शहद, क्या
रुत ने पलटी खायी है, अब नीम चबाना पड़ेगा ठाकुर॥
माना तेरी बगिया उजड़ी, माना तितली फुर्र उड़ बैठी
लेकिन उस कोयल की ख़ातिर, बाग़ लगाना पड़ेगा ठाकुर॥
कोई मीत नहीं, कोई प्रीत नहीं, साज़ों पे कोई संगीत नहीं
सावन बीता जाए है; मल्हार तो गाना पड़ेगा ठाकुर॥
जो होना था वो होना था, अब 'होनी' पे क्या रोना था
पर एक दिन तक़दीर पे भारी, एक दिवाना पड़ेगा ठाकुर॥
फिर भी गुड़िया रूठी है, अब चाँद तो लाना पड़ेगा ठाकुर॥
हुस्न कटोरी, इश्क का चमचा; चख ली तूने ढेर शहद, क्या
रुत ने पलटी खायी है, अब नीम चबाना पड़ेगा ठाकुर॥
माना तेरी बगिया उजड़ी, माना तितली फुर्र उड़ बैठी
लेकिन उस कोयल की ख़ातिर, बाग़ लगाना पड़ेगा ठाकुर॥
कोई मीत नहीं, कोई प्रीत नहीं, साज़ों पे कोई संगीत नहीं
सावन बीता जाए है; मल्हार तो गाना पड़ेगा ठाकुर॥
जो होना था वो होना था, अब 'होनी' पे क्या रोना था
पर एक दिन तक़दीर पे भारी, एक दिवाना पड़ेगा ठाकुर॥
Thursday, April 23, 2009
हमेशा जंग में हारे, वो अच्छा आदमी क्यों हो.....
हमारे ख़्वाब की ताबीर पर काई जमी क्यों हो
हमेशा जंग में हारे; वो अच्छा आदमी क्यों हो ?
जिस शहर ने औरत की इज्ज़त बेच खायी हो
उस शहर के राजा का कुरता रेशमी क्यों हो ?
मोहब्बत शर्त पर तो की नहीं जाती मेरे हमदम
मोहब्बत है तो फिर शिद्दत में अब कुछ भी कमी क्यों हो ?
उनको भूले अरसा गुज़रा, मुद्दत बीती आलम जाने
ये उनका जिक्र आते ही तेरी साँसें थमी क्यों हो ?
हमने तय किया ग़ज़लों में अबके आग भर देंगे
फिर मक़ते की बुनियाद पर इतनी नमी क्यों हो ?
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